मुख्यपृष्ठग्लैमर‘ऐसे मौके जीवन में बार-बार नहीं आते!’-दीपिका चिखलिया

‘ऐसे मौके जीवन में बार-बार नहीं आते!’-दीपिका चिखलिया

रामानंद सागर के मशहूर सीरियल ‘रामायण’ में सीता की भूमिका निभानेवाली दीपिका चिखलिया ने इस सीरियल में काम करने के बाद आगे चलकर ‘सुन मेरी लैला’, ‘दादा-दादी की कहानी’, ‘भगवान दादा’, ‘चीख’, ‘रात के अंधेरे में’ जैसे चंद धारावाहिकों में काम किया। हेमंत टोपीवाला से विवाह रचानेवाली दीपिका २५ वर्षों बाद दोबारा नए शो ‘धरतीपुत्र नंदिनी’ से सुर्खियों में हैं। पेश है, दीपिका चिखलिया से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

• शो ‘धरतीपुत्र नंदिनी’ स्वीकारने की क्या वजह रही?
मैंने खुद ‘धरतीपुत्र नंदिनी’ शो का निर्माण किया है। इस शो के जरिए मैं निर्मात्री बनी हूं। अभिनय के अलावा मैं खुद को क्रिएटिव कार्यों में इन्वॉल्व करना चाहती थी। अंतत: मैंने अपनी इस महत्वाकांक्षा को अंजाम दिया। शो ‘रामायण’ के बाद मैंने कुछ फिल्में और कुछ धारावाहिकों में काम किया। उद्योगपति हेमंत टोपीवाला से विवाह के बाद दो बेटियों की मां बनी। बेटियों के अपने करियर में व्यस्त होने के बाद मैंने अपने पैशन अभिनय और प्रोडक्शन को अपना वक्त देना तय किया।

•  अभिनय से दूर रहना आपके लिए कैसा रहा?
मैंने खुद को अभिनय से इसलिए दूर रखा क्योंकि मैं अपना पारिवारिक जीवन अपनी इच्छा से गुजारना चाहती थी। शादी, बच्चों का जन्म और उनकी परवरिश ऐसे खास मौके हैं, जो जीवन में बार-बार नहीं आते। अभिनय के ऑफर्स मिलते रहे लेकिन मैंने उन्हें स्वीकारा नहीं। मैं अभिनय से दूर रही लेकिन फिल्मी दुनिया से नहीं। मैं जानती थी कि जब कभी संभव हुआ तो मैं अभिनय में लौट सकती हूं। मैंने मातृत्व का आनंद उठाया उस वक्त अभिनय को बिलकुल भी मिस नहीं किया।

•  निर्मात्री बनने के पीछे क्या कोई खास वजह थी?
पिछले ३-४ वर्षों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर काफी अच्छा मनोरंजक कंटेंट देखने को मिल रहा है। मैंने सोचा कि अगर मेरा अपना प्रोडक्शन हाउस होगा तो मैं खुद अपनी टीम के साथ कंटेंट दे सकती हूं। अगर मेरे प्रोडक्शन के टीवी या ओटीटी शोज में मेरे लायक कोई किरदार हो तो मैं उन्हें निभा सकती हूं, जैसा कि ‘धरतीपुत्र नंदिनी’ में मैं एक महत्वपूर्ण किरदार निभा रही हूं।

•  अपने ही प्रोडक्शन में आपने दादी का किरदार निभाना क्यों मंजूर किया?
इस दौर में अगर कलाकारों को रिलेवेंट रहना है तो फिर क्या मां और क्या दादी का किरदार करने से परहेज? अगर किसी लड़की की शादी उसकी उम्र के २०-२२ वर्ष में हो जाए तो ४५ या ४७ की उम्र तक वो दादी बनती है, इसमें कोई अचरज वाली बात नहीं है। इसलिए ५० के आसपास मेरा दादी-नानी का रोल करना कोई गलत नहीं है। उम्र तो बस एक नंबर है।

•  रामानंद सागर के शो ‘रामायण’ में सीता बनने का अनुभव आपके लिए वैâसा रहा?
सागर साहब के शो ‘रामायण’ की शुरुआत १९८७ में हुई थी, जिसे अब ३६ वर्ष हो चुके हैं। इस धारावाहिक को उन्होंने बहुत प्यार, श्रद्धा, भक्ति और रिसर्च के साथ बनाया। दर्शकों के लिए अध्यात्म, भक्ति और श्रद्धा का महासागर छोड़ गए। मेरी तो आज भी पहचान ‘सीता मैया’ के रूप में है। इसी से आप समझ जाइए। मैं इसे अपनी खुशकिस्मती मानती हूं कि मुझे सीता बनने का मौका मिला।

• फिल्म ‘आदिपुरुष’ की नई सीता दर्शकों को क्यों अच्छी नहीं लगी?
यह प्रश्न सिर्फ सीता को नापसंद किए जाने का नहीं है। फिल्म ‘आदिपुरुष’ की टीम ने कितना रिसर्च किया, कास्टिंग वैâसे की, कहानी को कितना न्याय दिया जैसे कई प्रश्न सामने लाता है। सीता बनी कृति सेनन खूबसूरत नजर आर्इं लेकिन वनवास के दौरान सीता ने कॉटन की साड़ी पहनी थी पिंक सैटिन साड़ी नहीं। सीता या श्रीराम का किरदार निभाते समय किरदारों के चेहरे पर सादगी, सात्विक भावों की भी आवश्यकता होती है ऐसा मुझे लगता है शायद उन भावों की उनके चेहरे पर कमी थी। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि जो वाल्मीकि रामायण टीवी पर सागर साहब ने पेश किया ठीक वैसा ही रामायण अब नए युग में भी पेश किया जाए। खैर, कुछ नया पेश करने का उनका प्रयास था, जो दर्शकों को नहीं भाया।

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