मुख्यपृष्ठस्तंभआत्महत्या हल नहीं, परिस्थितियों से लड़ना सीखें

आत्महत्या हल नहीं, परिस्थितियों से लड़ना सीखें

दिल्ली से
योगेश कुमार सोनी

बीते दिनों एनसीआरबी ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसमें २०२१ में पूरे देश में १,६४,०३३ लोगों ने आत्महत्या की है जिसमें ८१,०६३ विवाहित पुरुषों की संख्या है और २८,६८० विवाहित महिलाएं थीं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि आत्महत्या करनेवालों में विवाहित पुरुषों की संख्या ज्यादा है। इस वर्ष में पारिवारिक समस्याओं के कारण तकरीबन ३३.२ फीसदी पुरुषों ने और ४.८ प्रतिशत पुरुषों ने विवाह संबंधी वजहों से अपना जीवन समाप्त कर लिया था। ये आंकड़े सामने आने के बाद सरकार में तनाव की स्थिति पैदा हो गई क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या करना कोई छोटी बात नहीं है। यह मानव जीवन पर अप्राकृतिक प्रहार माना जा रहा है। विवाहित पुरुषों द्वारा आत्महत्या के मुद्दे से निपटने और घरेलू हिंसा से पीड़ित पुरुषों की शिकायतों पर कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है। हालांकि, हम लगभग इस तरह के आंकडे हर वर्ष देखते हैं लेकिन २०२१ में इस बढ़ोतरी का कारण कोरोना से आर्थिक तंगी का भी माना जा रहा है। चूंकि कोरोना के बाद से हर स्तर पर सृष्टि पलट-सी गई थी। तमाम छोटी-बड़ी कंपनियों का बंद होना, जिससे कई लोगों के घरों में आर्थिक संकट आया और कलह हुई। यह मात्र एक वजह है, इसके अलावा कई प्रकार की अहम वजहें सामने आई हैं। मुख्यत: आजकल युवा जिस लाइफ स्टाइल की कल्पना करते हैं, वह हर किसी को मिल नहीं पाती। चूंकि आजकल लोगों में हर चीज को प्रदर्शित करने का चलन है, जिसको अंग्रेजी में शो-ऑफ भी कहते हैं। आजकल के कपल लिव इन रिलेशन में तो चार-पांच साल तक साथ रह लेते हैं, लेकिन वो ही कपल शादी होने के बाद एक महीना साथ नहीं रह पाते। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसका विशेष कारण यह है कि लड़की शादी से पहले वाले जीवन की अपेक्षा करती है, जो समय के साथ संभव नहीं हो पाता इसलिए गृहस्थी बसाने के बाद निश्चित तौर खर्चे बढ़ जाते हैं और वैसी जिंदगी नहीं रह जाती जैसी पहले थी। जैसा कि आत्महत्या करने में पुरुषों की संख्या महिलाओं की संख्या से आठ गुना अधिक है, जिसके लिए सर्वे में पाया गया है कि यदि जिंदगी महिलाओं के मुताबिक नहीं चलती तो वह झूठे मामलों में अपने पति व उसके घरवालों को जेल जाने की धमकी देती हैं, जिससे पुरुष डर व डिप्रेशन में आ जाता है और आत्महत्या जैसा गलत कृत्य कर लेता है। हर आत्महत्या करनेवाले को यह लगता है कि उसने अपनी परेशानी व जिम्मेदारियों से छुटकारा पा लिया, लेकिन वह यह नहीं सोच पाता कि उसके जाने से उसे माता-पिता या अन्य परिजन पूरी जिंदगी कितने दुखी रहते हैं। जब तक वह जिंदा रहते हैं, तब तक पूरी जिंदगी कुंठित होकर जीते हैं। उसे जीवन जीना नहीं पल-पल मरना कहते हैं और जिनके छोटे-बच्चे होते हैं, उनके बच्चों का जीवन नर्क बन जाता है। पुरुष का अन्य किसी लड़की से अफेयर व शराब पीकर महिलाओं को बुरी तरह पीटना मुख्य कारण माना जाता है। कई पुरुष अपनी गंदी हरकतों से बाज नहीं आते और शादी के बाद भी बाहर अफेयर चलाते हैं और जब वह पकड़े जाते हैं तो अपनी गलती स्वीकार करने की बजाय महिला को ही दोषी ठहराते हैं। मनोचिकित्सक के अनुसार, आजकल के युवाओं में बढ़ते डिप्रेशन की वजह से किसी भी बात को सहने की गुंजाइश खत्म होती जा रही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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