मुख्यपृष्ठस्तंभ संडे स्तंभ : मुंबई में भी घटा था एक ‘टाइटनिक’!

 संडे स्तंभ : मुंबई में भी घटा था एक ‘टाइटनिक’!

विमल मिश्र
‘हिंदुस्थान का टाइटनिक’ कहलाने वाले ‘एस.एस. रामदास’ पोत हादसे ने मुंबई में ७२४ अभागों की अरब सागर में जीते -जागते कब्र बना दी। मौत बगैर इत्तिला दिए आई थी। यह सब हुआ, जब देश की आजादी एक महीने से भी कम दूर थी।

मौत ने फंदा इस तरह कसा कि कोई बेचारा बचने के लिए हाथ-पांव तक नहीं मार सका। अभी आधा घंटा पहले जो हंसते-गाते, मजाक और मस्तियां करते खुशियों में मगन थे, अब मुर्दा थे। ऊपर तेज बारिश के साथ चिघ्घाड़ता घनघोर मेघा और नीचे कुछ देर पहले जहां एस.एस. रामदास पोत की रौनकें थीं, वहां अब था, अरब सागर की भीमकाय लहरों का प्रलयंकारी गर्जन-तर्जन। मौत तो अटल है, पर वह इस तरह आएगी, कौन अंदाज लगा सकता था!
‘इंडियन टाइटनिक’ का यह हादसा जो ७२४ अभागों को समुद्र में समा देनेवाली भारतीय इतिहास की सबसे भीषण सागरी दुर्घटना के रूप में याद‌ किया जाता है, देश की आजादी से ठीक एक महीना पहले घटा था। जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, मुंबई के परेल, लालबाग, गिरगांव जैसे इलाकों के साथ रेवास, अलीबाग, पेण, रोहा, जंजीरा, नंदगांव और मानगांव इलाकों के लोग समंदर के किनारे विलग हो गए मित्रों-संबंधियों के शवों की तलाश में जुटे हुए थे। मरनेवालों में ज्यादातर मछुआरे व कारोबारी थे, उनमें भी मराठीभाषी, मुस्लिम और नौकरीपेशा। ९० फीसदी गरीब और मध्यवर्गीय।
सिर पर सवार थी मौत
१७ जुलाई, १९४७ का वह दिन गटारी अमावस्या का था। सावन से पहले मनाया जानेवाला मौज-मस्ती का त्योहार। छुट्टी का दिन होने से आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी इस दिन। सुबह आठ बजे एस.एस. रामदास भाऊचा धक्का से रेवास जाने के लिए तैयार हो गया। कुल ७७८ लोग सवार हुए -६७३ वैध यात्री, ४८ खलासी, चार अधिकारी और १८ होटल स्टाफ। ऊपरी डेक पर परिवार के साथ कुछ अंग्रेज अधिकारी भी। सुबह आठ बजकर पांच मिनट पर वॉर्फ सुपरिटेंडेंट ने जैसे ही रवानगी की आखिरी सीटी बजाई, इससे पहले कि जहाज की सीढ़ियां हटें, ३५ बगैर टिकट यात्री भी दौड़कर जहाज पर लद लिए।
१,००० यात्रियों की क्षमता वाला ४०६ टन वजनी और करीब १७९ फुट लंबा व २९ फुट चौड़ा ट्विन स्क्रू पोत एस.एस. रामदास १९३६ में स्कॉटलैंड की क्वीन एलिजाबेथ की जहाज बनानेवाली कंपनी स्वान और हंटर ने बनाया था। ‘जयंती’, ‘तुकाराम’, ‘सेंट एंथनी’, ‘सेंट प्रâांसिस’, ‘संत जेवियर्स’ आदि साधु-संत और भगवानों के नाम वाले अपने दूसरे पोतों की तरह इसे संत रामदास का नाम दे दिया। ‘रामदास’ हफ्ते में पांच दिन गोवा और मुंबई के बीच चलता था और शनिवार को रेवास (अलीबाग) तक। बीती शाम को भारी बारिश हुई थी, पर रवाना होने के समय मौसम साफ था। बारिश से बचने के लिए तिरपाल लगे हुए थे। अचानक ही भारी शोर और तूफानी हवाओं के साथ तेज बारिश होने लगी। भीमकाय लहरों में जहाज हिचकोले खाने लगा। सुबह के ८.३५ बजे ‘रामदास’ कोलाबा तट से १० मील दूर गल्स आइलैंड (काश्याचा खाड़क) के निकट पहुंचा ही था कि धीरे-धीरे उसमें पानी भरना शुरू हो गया। जहाज में बहुत कम लाइफ जैकेट्स थे। जो लोग कुछ देर पहले एक-दूसरे से हंस-मुस्कुराकर बातें कर रहे थे उन्होंने अब लाइफ जैकेट्स के लिए लड़ना शुरू कर दिया। बाकी हाथ जोड़े और सजदे में खड़े थे, ईश्वर से जान बचाने की गुहार करते हुए।
एक मिनट में डूब गया जहाज
हर ओर चीख-चिल्लाहट का माहौल। मौत सामने देख यात्रियों ने विलाप करना शुरू कर दिया। कप्तान शेख सुलेमान इब्राहिम और चीफ ऑफिसर आदम भाई यात्रियों से शांति बनाए रखने की अपील करने लगे, पर सुनता कौन! तेज चल रही हवाओं से इस बार लहरें ऐसी उठीं कि ‘रामदास’ तिरछा हो गया। और दार्इं तरफ जैसे ही झुका सब बार्इं ओर भागे। जिन्हें तैरना आता था उन्होंने फौरन समुद्र में छलांग लगा दी। कई लोग तिरपाल में ही फंस गए। करंजा-कासा के पास जहाज असंतुलित होकर अब पूरी तरह से पलट गया। और देखते ही देखते समुद्र के बिल्कुल भीतर। डूबते वक्त कुछ बुलबुले उठे, फिर वह भी शांत। यह सब कुछ केवल एक मिनट के भीतर घटित हो गया।
‘भारत का टाइटनिक’ कहलाने वाले इस हादसे ने ७२४ अभागों की जान ली, जिनमें कुछ गर्भवती महिलाएं भी थीं। सलामत रहनेवाले खुशनसीब लोगों में १२ वर्षीय अब्दुल वैâस, रुबिन ससून नामक यहूदी और दो ब्रिटिश, प्रâांसिस ड्रार्इिंग और एम.जी. मॉल थे। कुछ कर्मचारियों के साथ जहाज के कप्तान शेख सुलेमान इब्राहिम भी बच गए। कुछ ही वर्ष पहले ८९ साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।
घंटों पता नहीं चली हादसे की खबर
यह जमाना वायरलेस ट्रांसमीटर और रेडियो संचार का नहीं था। लिहाजा, जो जहाज सुबह नौ बजे से भी पहले डूब गया था, उसकी खबर शाम पांच बजे तक नहीं पहुंची। आमतौर पर रेवास पहुंचने में करीब डेढ़ घंटे का समय लेनेवाला यह पोत जब शाम पांच बजे तक भी वहां नहीं पहुंचा तब जाकर ‌सबको चिंता हुई। बंदरगाह अधिकारियों को पहली खबर दिन तीन बजे हुई, जब तैरना जानने वाले, मछुआरों और लाइफ जैकेट की मदद से बचे कुछ लोगों ने ससून डॉक और रेवास पहुंच हादसे की जानकारी दी। इन्हीं खुशनसीबों में एक था १० साल का बारकू मुकादम, जिसे एक गश्ती नौका ने बचाकर गेटवे ऑफ इंडिया तक पहुंचा दिया था। बारकू शेठ मुकादम के बारे में पिछली बार जब सुना गया था, तब वे ९५ साल के थे। उनके साथ ही उस डूबते जहाज से जिंदा बच निकले थे १२ वर्षीय अब्दुल वैâस, जो ८९ वर्ष की उम्र तक जीवित रहे। घंटों बाद तेज बारिश के बीच बचाव और तलाशी अभियान शुरू किया गया। पर जीवित लोग बहुत कम ही मिल पाए। एलीफेंटा द्वीप और बुचर आईलैंड पर और शहर के बंदरगाहों के किनारे कई बहते शव मिले। बुचर आइलैंड पर इनमें से एक शव १३ वर्षीय प्रâांसीसी लड़की ला बाउचर्डियर का था, जो अपने माता-पिता और १४ वर्षीय भाई के साथ जहाज पर सवार हुई थी। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट ने जहाज का मलबा ढूंढने का निर्णय अगस्त, १९५१ में किया। १३.८ लाख रुपए की लागत से यह जिम्मेदारी एक इतालवी फर्म को सौंपी गई, पर इससे पहले कि वह काम शुरू करती यह मलबा १९५७ में बेलार्ड पियर के पास अपने आप उभर आया।
‘रामदास’ दुर्घटना ने समूचे देश को झकझोर दिया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ सरीखे कई संस्थानों ने पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए राहत कोष आरंभ किया। दो महीने बाद मरीटाइम कोर्ट ने जांच आरंभ की, जिसकी रिपोर्ट के मुताबिक शिपिंग कंपनी के दो अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया। मानसून में यात्री यातायात बंद करने का निर्णय हुआ। सभी जहाजों पर वायरलेस लगाना भी अनिवार्य कर दिया गया। जिस शहर में हिंदुस्थानी इतिहास का सबसे भीषण हादसा हुआ, उसे भी आज उसकी कोई याद नहीं। जिन मछुआरों ने बचाव अभियान में हाथ बंटाया था, उन्हें भारत सरकार ने पुरस्कार स्वरूप कॉलोनी के रूप में कुछ जमीन दी है, जो आज ‘बोदनी’ कहलाती है। मुंबई या कहीं भी ‘रामदास’ दुर्घटना के मृतकों की याद में कोई स्मारक नहीं है। पर गिरगांव के पुराने लोगों को वह बूढ़ा सा आदमी अभी तक याद है, जो हारमोनियम के साथ गाता फिरता था, ‘गेले ते बिचारे, जीव दर्या-तली गेले।’ उन ७२४ अभागों की याद में, जो इस अभागे पोत के साथ अरब सागर के तल में अंतिम नींद सो रहे हैं।
(अगले अंक में जारी)
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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