मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ : बहुत खास है बांद्रा स्टेशन!

संडे स्तंभ : बहुत खास है बांद्रा स्टेशन!

विमल मिश्र
सुंदर, अभिजात और आधुनिक बांद्रा का नाम सुनते ही जो पहली छवि नजरों में उभरती है, उस पर सटीक उतरता है बांद्रा स्टेशन। राष्ट्रीय विरासत सूची में शामिल बांद्रा पहला स्टेशन है, जिसका डिजाइन ही नहीं, पूरा ढांचा ही करीब १६५ फुट लंबी छत और सजावटी बुर्जों सहित लंदन में बना और जहाज से लाकर मुंबई में असेंबल किया गया।

कार्टर रोड, पॉली रोड, पेरी रोड व टर्नर रोड की फैशनेबल रंगीनियां। सी लिंक, बैंड स्टैंड, लिंकिंग रोड, जागर्स पार्क, बी.के.सी. व रिक्लेमेशन की रौनकें। बॉलीवुड का बेवर्ली हिल, पॉली हिल। शाहरुख खान, सलमान खान और सचिन तेंडुलकर के गुलजार व शर्ले राजन विलेज जैसे शांत बंगले। आटर्स क्लब, सेंट एंड्रूज व माउंट मेरी जैसे पुराने चर्च व मेले। बांद्रा फेस्टिवल जैसे आयोजन। लकदक शॉपिंग मॉल्स, डिस्को व फैशन स्टोर्स, जिमखाने, रेस्टोरेंट, बार और निराले अंदाजे बयां वाला अलहदा देसी कॉलोनियल रहन-सहन… बांद्रा शहर का सबसे कॉस्मोपोलिटन लुक वाला सबर्ब है, जहां घर या वर्किंग प्लेस होना अपने आप में रुतबा है।
‘क्वीन ऑफ सबर्ब्स’ का स्टेशन भी इतना ही खास है-छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, चर्चगेट और भायखला के साथ मुंबई का सबसे खूबसूरत रेलवे स्टेशन। उन्हीं की तरह रेलवे की राष्ट्रीय विरासत सूची का अंग, जिसके सौंदर्य को निहारते विदेशी पर्यटक व कला वैभव को वैâनवासों में संजोते कला छात्र आपको कभी भी दिख जाएंगे। विक्टोरियन गोथिक और देशी वास्तु का मिश्रण ग्रेड-१ का यह ‘हेरिटेज’ स्टेशन शायद पहला स्टेशन है, जिसका डिजाइन ही नहीं, पूरा ढांचा लगभग १६५ फुट लंबी छत और सजावटी बुर्जों सहित ही लंदन में बना और जहाज में लाकर असेंबल (१८६९) किया गया। इसकी सजावटी छतें चार साल बाद और बाहरी इमारत १८८० में बनी।
स्टेशन मास्टर के कार्यालय के बाहर खड़े होकर अगर आप प्लेटफॉर्म नंबर दो की ओर बिल्कुल सीध में टकटकी बांधें तो पटरियों में काम आनेवाले लोहे के पुराने खंभों पर टिकी मेहराबों में ‘१८८८’ झांकता दिखेगा। ‘१८८८’ यानी स्टेशन भवन बनने का साल। ऐसे कुल छह खंभे स्टेशन पर हैं, जिन पर तीन कोचों (उस जमाने में ट्रेनों में इतने ही कोच होते थे) को ढकनेवाला मूल शेड टिका है।
वॉच टॉवर से नजर
रॉट आयरन पर पच्चीकारी के बारीक काम, बड़े-बड़े दरवाजों, गहरे बरामदों, खिड़कियों, छज्जों व मेन गेट के पोर्टिको के ऊपर पिरामिडनुमा लाल टाइलों के रूफ टॉवर वाला बांद्रा स्टेशन का आकर्षक भवन दो प्लेटफॉर्मों के साथ १८८८ में बन तो गया, पर खुल पाया अगले वर्ष-इंग्लैंड से ‘छत’ आ पाने के बाद ही। यह रूफ टॉवर परिचायक है टेलीफोन और टेलीग्राफ लाइनें आने से पहले वॉच टावर के रूप में इस्तेमाल किए जाने का। जैसे ही साहब लोगों की कोई ट्रेन आती पोर्टर उस पर लगी बेल को बजाते और बाहर इंतजार करते मुसाहब दौड़े आते। १९६० के दशक तक यहां विक्टोरिया गाड़ियों की रेल-पेल लगी रहती थी। पुराने यात्रियों को ट्रेनों के आने और जाने के वक्त पीतल के उस घंटे की मधुर टंकार याद है, जो स्टेशन अधीक्षक के कार्यालय के बाहर आज भी मौजूद है। स्टेशन के निर्माण का कुछ काम मेसर्स बाझोनजी एंड दोसा भाई बागजी ने किया। समूचे कार्य की लागत उस वक्त १,५८,७९७ लाख रुपए और चार आने की लागत आंकी गई थी, पर सिर्फ १,४३,४३९ रुपए में ही काम पूरा करवा अंग्रेज बहादुर ने अपनी पीठ थपथपा ली थी। इतने सुंदर स्टेशन की डिजाइन हड़बड़ी में बनी यह जानकर आपको सहज ही विश्वास नहीं होगा।
अगस्त, १८९६ में मुंबई में जोरों का ब्यूबोनिक प्लेग पैâला तो बांद्रा जहाजों से आनेवाले थर्ड क्लास के यात्रियों की क्वारंटाइन जांच का ठिकाना बना, जहां ‘बीमार’ लोगों की पहचान की जाती और ग्रांट रोड के ‘सेग्रिगेशन वैंâप’ भेज दिया जाता।
मेकओवर से निखरी शोभा
बीते वर्षों में मौसम की मार व लीकेज से, दीमक से दरवाजों व खिड़कियों सहित बांद्रा स्टेशन का बीम व बेंचों सहित बर्मा टीकवुड का बना ढांचा खराब हो गया था। प्लेटफार्मों के ऊपर लकड़ी में मढ़ी मंगलूर टाइल वाली कवरिंग, स्लैटेड होर्डिंग, आइरन साइन होल्टर और विक्टोरियन पैâशन के टेलीफोन बूथ गायब होते गए थे। बिना सोचे-समझे पेंट, सिमेंट, कीलों और दूसरे काम करने से शोभा बनने के बजाय बिगड़ गई थी।
सुरेश प्रभु के रेल मंत्रित्व कार्यकाल में भारतीय रेल और यूनेस्को के बीच स्टेशन के मेकओवर और प्रबंध योजना के लिए समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। २०११ में कंजर्वेशन आर्किटेक्ट आभा नारायण लांबा ने रिनोवेशन में हाथ लगाया और गलतियां दुरुस्त कीं। इस पर ६३ लाख रुपए से अधिक का खर्च आया। मंगलूर टाइलों और लकड़ी के तख्तों की जगह टीकवुड की और हॉल, बरामदों और कमरों में कोटा पत्थरों और सिरामिक फ्लोरिंग की जगह ग्रेनाइट स्लैब डाले गए। कांचों को पहले जैसा लुक दिया गया। प्लेटफॉर्म शेड के लिए बदलाव करते समय नैसर्गिक प्रकाश की जरूरत पर ध्यान दिया गया। मूल स्वरूप देने के लिए २० तरह के काम किए गए। इस पर कुल लागत १२ करोड़ रुपए से अधिक आने का अनुमान है। २०१५ में पश्चिम रेल ने बांद्रा को मुंबई के सांस्कृतिक और पर्यटन हब के रूप में विकसित करने का निर्णय किया। इसे यूनेस्को से विश्व विरासत का दर्जा दिलाने के लिए भी प्रयास हुए। २०१७ में स्टेशन के बाहर भीड़-भाड़ कम करने लिए आठ करोड़ रुपए की योजना पर काम शुरू हुआ। इसके तहत सड़क चौड़ी करने और नए पुल, एलीवेटेड डेक और एस्केलेटर्स बनाने के साथ पूर्वी दिशा के बुकिंग ऑफिस को कुछ दूर खिसकाया गया। पश्चिम दिशा में सड़क चौड़ी करने के लिए रेलवे के कुछ स्टॉफ क्वार्टस को ध्वस्त भी करना पड़ा। २०२१ में दक्षिणी सिरे पर ८० मीटर लंबे और १० मीटर चौड़े सात करोड़ रुपए लागत वाले नए फुटओवरब्रिज के निर्माण ने भीड़-भाड़ से कुछ राहत दी।
प्रथम दर्जे का पहला महिला प्रतीक्षालय
बांद्रा को हिंदुस्थान में प्रथम दर्जे का पहला महिला प्रतीक्षालय देने का श्रेय हासिल है। माउंट मेरी मेले के दौरान यहां के लिए दो विशेष ट्रेनें चलाने का उल्लेख भी मिला करता है। २३ मई, १९२५ को नए आइलैंड प्लेटफॉर्म के साथ स्टेशन की रिमॉडलिंग की गई। ३ फरवरी, १९२६ को जीआईपी रेलवे ने बांद्रा में अपनी विद्युत ट्रेन चलाई। मई, १९३५ में यहां बिजली के सिग्नलों का उपयोग करनेवाला पहला केबिन बना। पश्चिम रेल की बिजली जरूरतों के लिए स्टेशन पर २०१० से ९० मेगावाट का नया बिजली उत्पादन सब स्टेशन भी काम कर रहा है। भारतीय रेल ने १,१०० करोड़ रुपए लागत से देश के २३ स्टेशनों के अर्धनिजीकरण से कायाकल्प की जो योजना बनाई है, उनमें मुंबई सेंट्रल, ठाणे, बोरिवली और लोकमान्य तिलक टर्मिनस के साथ बांद्रा भी है। चर्चगेट और अंधेरी के बाद यह पश्चिम रेल का दूसरा व्यस्ततम स्टेशन है, जिसका ४,९१,१०६ यात्री उपयोग करते हैं। २०१७ में यह भारतीय रेलवे का सातवां स्वच्छतम स्टेशन घोषित हुआ। रेलवे का पुलिस थाना होने के साथ यहां एंबुलेंसों से सज्ज रेल की चिकित्सा इकाई भी है। मुंबई के पहले स्काईवॉक वाला स्टेशन होने के साथ बांद्रा पहला उपनगरीय स्टेशन है, जहां प्लेटफॉर्म एक पर माताओं के लिए ‘ब्रेस्टफीडिंग रूम’ है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

अन्य समाचार