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संडे स्तंभ : हिंदी का रत्नागार

विमल मिश्र
मुंबई में सीपी टैंक स्थित ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ देश के सबसे पुराने प्रकाशन संस्थानों में से है। इसके संस्थापक पं. नाथूराम प्रेमी ने जहां मुंशी प्रेमचंद, जैनेंद्र, यशपाल व हजारीप्रसाद द्विवेदी सरीखे लेखकों को हिंदी में प्रतिष्ठित किया, वहीं शरत, टैगोर और बंकिम सरीखे बंगला कथाकारों से भी हिंदीभाषियों का पहला परिचय करवाया। मुंबई में पुस्तकों की पहली दुकान यही है।

सी. पी. टैंक में हीराबाग स्थित ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ की सीढ़ियां पुराने जमाने के मकानों सरीखी ऊंची हैं। इसके बीचो-बीच टंगी पांच दशक पुरानी लंबी- मोटी पीतल की सांकल देखकर आप चौंक जाएंगे। दरअसल, यह सांकल नहीं है … यह सहारा है सरस्वती के इस द्वार का।
हिंदी का रत्नागार है ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’। उपलब्धियों के लिहाज से, और उससे भी अधिक सत्साहित्य के सृजन के लिए और पाठकों में निज भाषा के प्रति अनुराग पैदा करने के लिए। न सिर्फ हिंदी का ‘सर्वश्रेष्ठ’ उपन्यास माना जाने वाले मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’, ‘सप्तसरोज’ व ‘नवनिधि’ सबसे पहले यहां से प्रकाशित हुए, बल्कि वह जैनेंद्र की ‘त्यागपत्र’ और ‘परख’ आदि आरंभिक कृतियों के प्रकाशन का भी ठिकाना बना। उसी को श्रेय जाता है हजारीप्रसाद द्विवेदी, यशपाल, आचार्य चतुरसेन और पं. सुदर्शन को हिंदी जगत में प्रतिष्ठित करने का। शरतचंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद चट्टोपाध्याय, द्विजेंद्र लाल राय और के. एम. मुंशी सरीखों को हिंदी पाठकों तक सर्वप्रथम पहुंचाने का गौरव भी ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ को ही हासिल है।
सदी से लंबे कालखंड में कितने ही हिंदी प्रकाशन संस्थान खुले और बंद हो गए, पर ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ ने अपनी पुरानी प्रतिष्ठा, गुणवत्ता, विश्वसनीयता और पठनीयता कायम रखी है। अपने काल में वह खेमराज श्रीकृष्णदास और निर्णयसागर के साथ हिंदुस्थान के शीर्ष तीन प्रकाशन संस्थानों में था। जाने-माने उपन्यासकार विष्णु प्रभाकर की नजर में ‘हिंदी प्रकाशनों का भीष्म पितामह’।
बापू के स्वागत समारोह में प्रेमीजी
१३ जनवरी, १९१५ को महात्मा गांधी जब दक्षिण अप्रâीका से लौटे तो सी. पी. टैंक स्थित हीराबाग के सुंदर सभाभवन में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की अध्यक्षता में हुए उनके इस स्वागत समारोह में पं. नाथूराम प्रेमी भी मौजूद थे, जो इसी भवन की तल मंजिल में अपना प्रकाशन गृह चला रहे थे। विभिन्न भाषाओं के साहित्य में गोते लगाते प्रेमीजी ने महसूस किया कि हिंदी में पठनीय साहित्य दूसरी भाषाओं की तुलना में कम है। ऐसे ही एक क्षण उनके हाथ लगा जॉन स्टूअर्ट मिल के विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘ऑन लिबर्टी’ का अनुवाद ‘स्वाधीनता’। यह अनुवाद महावीरप्रसाद द्विवेदी का ही किया हुआ था। प्रेमीजी ने तय किया कि जैन पाठकों को विचार स्वातंत्र्य के प्रति जागरूक करने के लिए इस पुस्तक की २०० प्रतियां खरीदकर पढ़ाएंगे।
प्रेमीजी के घर में रहे प्रेमचंद
प्रेमीजी का जन्म २६ नवंबर, १८८१ को सागर जिले के देवरीकलां में हुआ। उनके पूर्वज दिगंबर जैन धर्म के परवार समुदाय से ताल्लुक रखते थे और बुंदेलखंड से यहां आकर बस गए थे। पिता टूंडेलाल मोदी – जो साहूकारी का काम करते थे – की तीन संतानों में वे सबसे बड़े थे। प्रेमीजी के पड़पौत्र मनीष मोदी बताते हैं, ‘शिक्षक की नौकरी छोड़कर प्रेमीजी केवल १० रुपए लेकर १९०१ में मुंबई आए थे। सुंदर हस्तलिपि ने उन्हें हीराबाग धर्मशाला स्थित प्रांतीय दिगंबर जैन‌ तीर्थक्षेत्र समिति में नौकरी दिला दी। यहां एक घटना ऐसी हुई, जिससे उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली। मालिकों का उनके प्रति अटूट विश्वास देखकर कुछ सहकर्मियों ने साजिश रची और उनकी झूठी शिकायत कर दी। उनकी ईमानदारी, मेहनत और अध्ययन में रुचि देखकर हीराबाग के मालिक सेठ माणिकचंद्र जवेरी और पानाचंद ने उन्हें भवन में चार कमरे देकर उन्हें खुद का प्रकाशन शुरू करने की सलाह दी। इस तरह अपने परम हितैषी पन्नालाल के साथ १९०५ में उन्होंने ‘जैन ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय’ से प्रकाशन की शुरुआत की। २४ सितंबर, १९१२ को उन्होंने ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ की नींव रखी।’
प्रेमीजी ने जो संस्कार, आदर्श और उसूल प्रकाशन क्षेत्र में बरते उनका पालन पारिवारिक जीवन में स्वयं भी किया। बाल विवाह और दहेज जैसी प्रथाओं के सख्त विरोधी प्रेमीजी ने अपने छोटे भाई का विवाह एक बाल विधवा से कराया था और पुत्र हेमचंद्र का विवाह गांव के सबसे गरीब घर की कन्या के साथ, जबकि छोटे पौत्र का विवाह एक जाति बहिष्कृत जैन परिवार की बेटी से कराया। मनीष ने अंग्रेजी में स्नातक अपनी मां विजयलक्ष्मी से सुना है कि प्रेमचंद, प्रेमीजी के परिवार के साथ तीन महीने मुंबई रहे।
प्रेमीजी आडंबरों के सख्त खिलाफ थे। १९४६ में कोलकता में प्रेमी अभिनंदन ग्रंथ का आयोजन किया गया था। बंगाल उस समय भीषण अकाल की चपेट में था। यह सुनकर उन्होंने अपने ही सत्कार में आने से मना कर दिया था कि वहां विशाल भोज का आयोजन किया जाने वाला है।
श्रेष्ठ लेखक और संपादक
‘प्रेमी’ पं. नाथूराम का कवि नाम था। उनके उस्ताद होते थे सैयद अमीर अली मीर। प्रेमीजी ने उर्दू और ब्रज भाषा में जो कवित्त लिखे वे उस काल की प्रमुख पत्रिकाओं में छपते थे। प्रकाशन क्षेत्र में उनका पहला उसूल यह था कि वे केवल संस्कारशील पुस्तकें ही छापेंगे। उनके प्रकाशनों को लोकप्रिय बनाया दूसरी भाषाओं के प्रसिद्ध लेखकों के अनुवादों ने। प्राकृत, संस्कृत. अपभ्रंश, बंगला और उर्दू से पुस्तकों के हिंदी अनुवाद उन्होंने खुद ‌किए।
जैन ग्रंथों का पुनरोद्धार
मुंबई आकर प्रेमीजी ने संस्कृत, प्राकृत, उर्दू, मराठी, बंगला, गुजराती आदि भाषाएं सीखीं और ‘जैन मित्र’ और ‘जैन हितैषी’ पत्रों के साथ ‘अर्धकथानक’ और ‘बनारसीविलास’ सहित प्रसिद्ध पुस्तकों के संपादक बने। ‘जैन साहित्य और इतिहास’ उनकी महत्वपूर्ण कृति है। १९१५ में सेठ मानिकचंद्र की स्मृति में उन्होंने ग्रंथमाला का शुभारंभ किया और लक्ष्य रखा भाषाविदों द्वारा संपादित जैन शास्त्रों का व्यवस्थित रूप से प्रकाशन कर उनका विक्रय लागत मूल्य पर करना। जैन शास्त्र – जो उन दिनों ताड़पत्रों पर लिखित और बहुत बुरी हालत में होते थे – प्रेमीजी उनके उद्धारक बन गए। प्रेमीजी आजीवन रूढ़िवाद के विरुद्ध सुधारवाद का ध्वज बुलंद करते रहे। कम उम्र में ही दिवंगत हुए पुत्र की स्मृति में हेमचंद्र मोदी पुस्तकमाला और संशोधित साहित्यमाला उन्होंने १९४२ में आरंभ की। १९६१ में ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय का दिल्ली केंद्र भी खुला, जो १९८० तक चला। पौत्र यशोधर मोदी द्वारा उनकी याद में शुरू पं. नाथूराम प्रेमी रिसर्च सीरीज आज भी उनकी याद दिलाती है।
‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ में विख्यात भारतीय व अंतरराष्ट्रीय लेखकों की लिखी हिंदी, प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश और अंग्रेजी भाषाओं में साहित्य, भाषाविज्ञान, धर्म, पुराण, दर्शन, भारत विद्या, जैन विद्या, इतिहास, संस्कृति, कला, वास्तुकला, संगीत, रहस्यवाद, योग, तंत्र, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, पुरातत्व सहित विभिन्न विधाओं में ५०० से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं।
३० जनवरी, १९६० को वृद्धावस्था में प्रेमीजी का देहांत हो गया, तब बड़े पौत्र यशोधर मोदी ने ‘हिंदी ग्रंथ कार्यालय’ को संभाला। २०१४ में उनके निधन के बाद यशोधर जी के पुत्र मनीष मोदी पत्नी निरुपमा और पुत्र सम्यक की सहायता से संस्थान संभाल रहे हैं। हिंदी के प्रति नई पीढ़ी की ललक को मनीष मोदी को साहि‌त्यिक और सांस्कृतिक पुनरोत्थान के लिए शुभ लक्षण मानते हैं – वह लक्ष्य जो उनके पूज्य परदादा आजीवन निर्वाह करते रहे।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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