मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ : ये हेरिटेज इमारतें ऋणी हैं मेट्रो के ‘जुगाड़’ की

संडे स्तंभ : ये हेरिटेज इमारतें ऋणी हैं मेट्रो के ‘जुगाड़’ की

विमल मिश्र
मुंबई की सबसे महत्वपूर्ण मेट्रो परियोजना मेट्रो-३ (कोलाबा-बांद्रा-सीप्झ) का निर्माण करते समय विकास और विरासत का द्वंद्व लगातार बना रहा। साथ में थी फोर्ट और ओवल क्षेत्र की हेरिटेज इमारतों की सुरक्षा की दुश्चिंता। भारतीय इंजीनियरों ने इस फिक्र को दूर किया तकनीक और कौशल के साथ ‘जुगाड़’ से।
मुंबई की सबसे महत्वपूर्ण मेट्रो परियोजना मेट्रो-३ (कोलाबा-बांद्रा-सीप्झ) के लिए खुदाई और बोरिंग का काम शुरू होते ही विरासतदानों के चेहरों पर शिकनें नजर आने लगी थीं-कहीं इससे फोर्ट, ओवल और कालबादेवी क्षेत्रों की विरासती ऐतिहासिक इमारतों के लिए खतरा न पैदा हो जाए। भारी-भरकम मशीनों की पाइलिंग और बोरिंग से दिन-रात होनेवाले कंपन ने यह चिंता बढ़ा दी। फिर एक दिन अचानक देखा फ्लोरा फाउंटेन की प्रतिमा के हाथ कांप रहे हैं। जे.एन. पेटिट इंस्टीट्यूट और आर्मी एंड नेवी बिल्डिंग के कुछ हिस्से नीचे जा गिरे, सिद्धार्थ कॉलेज में दरारें नजर आने लगीं, जेर महल एनेक्सी की तीसरी मंजिल ध्वस्त हो गई और डी.एन. रोड की ताज बिल्डिंग में मौजूद आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सेंटर को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ गया। ‘फर्नीचर कांपते हैं और टेबल पर रखे बर्तन ‘धड़ाम’ करते नीचे गिर जाते हैं’ नुमा शिकायतें चीरा बाजार जैसे दक्षिण मुंबई के इलाकों ही नहीं, दादर और अंधेरी जैसे क्षेत्रों के लोगों को भी दहलाने लगीं। मुंबई का पारसी समाज खासकर आंदोलित था। मेट्रो चर्चगेट के पास भीखा बहराम कुएं और ‌प्रिंसेज स्ट्रीट जंक्शन पर एच.बी. वाडियाजी आतश बहराम और अंजुमन आतश बहराम मेट्रो के बिलकुल पास से गुजरने वाली थी और पारसियों को डर था इससे भूमिगत पवित्र अग्नि की पावनता प्रभावित होने को लेकर। लोगों के घायल होने की छिटपुट खबरें भी आने लगीं।
मेट्रो के निर्माण को लेकर आशंकाओं और आलोचनाओं का दौर लंबा चला। अकेले गिरगांव, चीरा बाजार और कालबादेवी के बीच कई इमारतें गिरानी पड़ीं, जिससे बहुत से परिवार और व्यावसायिक इकाइयां विस्थापित हो गए और महंगी पुनर्वास योजना से उन्हें बसाना पड़ा। मुंबई हाईकोर्ट को कई बार सुरक्षा संबंधी ‌निर्देश देने पड़े, जिनमें खुदाई करने पर अस्थाई रोक और काटे जानेवाले पेड़ों को पुनर्रोपित करने व डेसिबल लेवल पर शोर को मापने के आदेश शामिल थे। मुख्यमंत्री सहित प्रमुख लोगों को ज्ञापन दिए गए और सिद्धार्थ कॉलेज के अध्यापक-छात्रों और पारसी समुदाय ने हस्ताक्षर अभियान छेड़ दिया। गिरगांव के कुछ विस्थापित नागरिकों ने तो सरकार से इच्छा मृत्यु की दरख्वास्त भी कर डाली।
मेट्रो का निर्माण अब पूर्ण होने को है और ये सारी आशंकाएं खामखयाली निकलीं। इसकी वजह है भारतीय इंजीनियर और उनके ‘जुगाड़’। मेट्रो-३ के कफ परेड से हुतात्मा चौक तक के पैकेज-१ का निर्माण करनेवाली दो कंपनियों में एक लार्सन एंड टुब्रो के प्रोजेक्ट मैनेजर पलविंदर सिंह द्वारा पिछले दिनों यूनान के एथेंस में वर्ल्ड टनल कांग्रेस में पढ़े गए पर्चे के बाद दुनिया जान गई है कि किस तरह क्षेत्र की हेरिटेज इमारतों-खासकर हुतात्मा चौक क्षेत्र को नुकसान न पहुंचने के लिए ये ‘जुगाड़’ भी जिम्मेदार हैं।
फोर्ट और ओवल का ‘हेरिटेज प्रेसिंक्ट’ आर्ट डेको बिल्डिंग्ज और विक्टोरियन गोथिक स्थापत्य की इमारतों से भरा है, जिनमें ज्यादातर ७५-८० वर्ष पुरानी हैं हेरिटेज नियमों के तहत जिनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। टाउनहॉल जैसी दो सदी से ज्यादा पुरानी इमारतों को अपवाद मान लें तो बहुत सी इमारतों की नींव बलुई और ज्यादा गहरी नहीं होने के कारण उनकी मजबूती के बारे में ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। भारी मशीनों से बोरिंग किया जाना उनके लिए खतरे का कारण बन सकता था। इसलिए सुरक्षा उपायों में पहला कदम था एहतियात बरतना। मेट्रो का काम आगे बढ़ाते समय ज्यादा कंपन की वजह से इन इमारतों की नींव और दूसरी जगह नुकसान न पहुंचे इसके लिए जरूरी निगरानी के लिए सेंसर लगाए जाने पर जोर दिया गया। ड्रिलिंग और बोरिंग जैसे कामों में आनेवाली मशीनों के वैâलिबरेशन और पानी का संतुलन बनाए रखने पर भी विशेष ध्यान रखा गया, ताकि ड्रिल करने से निकला पानी और बालू निकलकर आस-पास की इमारतों के नीचे दरारें पैदा कर उन्हें नुकसान न पहुंचाएं-इस सावधानी के साथ कि भूगर्भ जल का स्तर ही कहीं कम न हो जाए। एक दूसरी समस्या यह थी कि कई जगह मेट्रो के प्रवेश और निकास मार्ग फुटपाथ पर होने जा रहे थे, जिनमें कई पहले से ही संकरे थे। यह देखना जरूरी हो गया कि ये बेचारी इमारतें तो अपना खुला स्थान न गवां दें और पैदल चलनेवालों के लिए जगह बची रहे।
हुतात्मा चौक की चुनौती
सबसे बड़ी समस्या तो पेश आनी थी हुतात्मा चौक क्षेत्र की हेरिटेज और दूसरी पुरानी इमारतों के नीचे २५३ मीटर लंबा, ९.७ मीटर ऊंचा और ११.७८ मीटर चौड़ा प्लेटफॉर्म टनल बनाने में। साधारणत: इंजीनियर इस तरह की परियोजनाओं में ‘कट एंड कवर’ तकनीक को इस्तेमाल में लाते हैं। यानी काटने के बाद नीचे जाते हुए स्टेशन को नीचे से ऊपर की तरफ बनाते जाना। पर इस मामले में प्लेटफॉर्म और ट्रैक के निर्माण के लिए इसका केवल आंशिक प्रयोग ही संभव था, क्योंकि सड़क संकरी थी और ऊपर हेरिटेज इमारतें थीं। इसलिए मेट्रो टीम ने पहला ‘जुगाड़’ किया-वह सड़क की ओर से कट करके नीचे गई और और प्लेटफॉर्म और ट्रैक बनाने के लिए हेरिटेज इमारतों के नीचे कनेक्टिंग मार्ग के माध्यम से क्षैतिज रूप से खुदाई की। हेरिटेज इमारतों और नीचे की प्लेटफॉर्म सुरंग के बीच लगभग १२.५ मीटर का अंतर रखा गया।
दूसरा ‘जुगाड़’ था हेरिटेज निर्माणों के आस-पास विस्फोट करते समय सामान्यत: पीपीवी जो पांच मिमी/सेकंड होता है, उसे घटाकर २.५४ मिमी कर देना। सुरक्षा के लिए इन इमारतों को ऊपर और नीचे-दोनों तरफ से सहारा दिया गया। तीसरा ‘जुगाड़’ था खुदाई के दो तरीकों को मिलाकर काम में लाना। ड्रम कटर और कम चार्ज व लंबे अंतराल वाले छोटे-छोटे विस्फोटों का उपयोग किया गया। चट्टानों की बाहरी तरफ छेद करने के लिए ड्रम कटर इस्तेमाल में लाया गया, जिसके बाद विस्फोट स्थलों के आस-पास और अधिक छेद करने के लिए यह प्रक्रिया दोहराई जाती रही। इस जगह चट्टानें बहुत कठोर होने से यह काम बहुत कठिन था। विस्फोटों के बिना यह संभव ही नहीं होता, इसलिए नियंत्रित ढंग से उनका सहारा लिया गया। तीन पारंपरिक विस्फोटों के बजाय १५ लघु विस्फोट किए गए और इस तरीके से कि ऊपर की इमारतों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इस तरह २५३ मीटर लंबी इस प्लेटफॉर्म सुरंग को बनाने में लगभग १०,००० लघु विस्फोट किए गए। हर इमारत पर प्रभाव की निगरानी के लिए उपकरण लगाए गए और उन पर २४ घंटे निगरानी रखी गई। अगर ऐसा न होता तो चर्चगेट से आकर आजाद मैदान की ओर जानेवाली टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) की वजह से करीब २६ महीने का विलंब हो जाता।
पश्चिमी देश की मेट्रो हैं मिसाल
भारतीय इंजीनियरों के ये जुगाड़ कोई नए नहीं हैं। हेरिटेज इमारतों को धंसने या टेढ़ी होने से बचाने के लिए ‘कांपेंसेशन ग्राउटिंग’ और ‘टॉप डाउन’ जैसी नई तकनीकें आज मौजूद हैं। विरासत संरक्षण वास्तुविद आभा नारायण लांबा बताती हैं, ‘लंदन, पेरिस, एथेंस, रोम और न्यूयॉर्क जैसे यूरोप व अमेरिका के कई शहर हैं जो सौ साल से भी ज्यादा समय से बगैर किसी समस्या के हेरिटेज क्षेत्रों में भूगर्भ रेल कामयाबी से चला रहे हैं।’ अर्बन डिजा‌इन‌ रिसर्च इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक पंकज जोशी बताते हैं, ‘इन शहरों की हेरिटेज इमारतों के बिलकुल करीब, यहां तक कि उनके ठीक नीचे से गुजरते हुए भी मेट्रो ने उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।’ डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन का एक स्टेशन एक प्राचीन चर्च के ठीक नीचे है। ऐतिहासिक इमारतों से भरे नीदर लैंडस की राजधानी एम्सटर्डम में नार्थ-साउथ मेट्रो लाइन का निर्माण करते समय इं‌जीनियरों को भूगर्भ जल की बहुलता और मिट्टी बहुत नर्म होने की चुनौती का सामना करना पड़ा, इसलिए वहां कमजोर नींव वाली ‌इमारतों को पुख्ता करने का काम भी साथ-साथ चला। मुंबई और यूरोप-अमेरिका की हेरिटेज इमारतों की तुलना करते समय यह बात ध्यान में रखनी जरूरी है कि मुंबई की इमारतों को मौसम के वैसे अतिरेक का सामना नहीं करना पड़ा, जैसे पश्चिमी देशों की इमारतों को।
आज जब मेट्रो-३ शुरुआत के बिलकुल करीब है आशा की जानी चाहिए कि इससे ओवल मैदान सहित दक्षिण मुंबई की बेहतरी का रास्ता भी खुलेगा। मिसाल मौजूद हैं। दिल्ली में सेंट्रल पार्क और बंगलुरु में बुलेवार्ड को वहां के मेट्रो कॉर्पोरेशन ने लिया था और लौटाए जाने के बाद आज ये वहां के प्रमुख पर्यटक स्थल हैं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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