मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ : मरीन ड्राइव किसका है?

संडे स्तंभ : मरीन ड्राइव किसका है?

विमल मिश्र
मरीन ड्राइव…शहर की मशहूर पहचान और उसका सबसे जीवंत स्थान, जहां आए बिना मुंबई की कोई यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। पर, अब पुलिस को यहां रोज उमड़ने वाली भीड़ को नियंत्रित करने में पसीने आ रहे हैं।

बीते रविवार मरीन ड्राइव पर तफरीह करने आए सैलानी एक अप्रत्याशित नजारा देखकर दंग थे। पुलिस ४.३ किलोमीटर लंबे इस प्रॉमीनेड पर उमड़े विशाल हूजूम को खदेड़ने में लगी थी। बल – प्रयोग की भी नौबत बस आने ही वाली थी।
पुलिस ने यह कार्रवाई स्थानीय बाशि‌ंदों के एक समूह की शिकायत पर की, कि सप्ताहांतों में बहुत बड़ी तादाद में सैलानियों के उमड़ आने से मरीन ड्राइव पर शोर – गुल बेइंतहा बढ़ गया है और आए – दिन कानून और व्यवस्था की समस्याएं पैदा हो रही हैं। ये लोग यहां जोर से म्यूजिक बजाते हैं, रील बनाते हैं। शो करते हैं, यहां तक कि मोटरसाइकिल रेस भी। कई बार तो शालीनता की सीमाओं को पार कर जाते हैं। कोविड के प्रतिबंध खत्म हो जाने के बाद तो स्थिति काबू से बाहर होती जा रही है। इससे रोजाना की उनकी सैर का कार्यक्रम बाधित हो रहा है। बुजुर्गों की परेशानी ज्यादा बढ़ी है, जिन्हें दुर्घटनाग्रस्त होने और लूटे जाने का खतरा बढ़ गया है।
पुलिस की इस कार्रवाई को आलोचना का सामना करना पड़ा। ‘यह सार्वजनिक स्थान है, मरीन ड्राइव पर रहने वाले धनिक और वीआईपी लोगों की बपौती नहीं’, बहराइच से यहां घूमने आए बनवारी सि‌ंह ने कहा। नागरिकों का कहना है कि मुंबई की सबसे बड़ी शोभा क्वींस नेकलेस ही है, जहां से समुद्र का दूर तक अबाधित नजारा दिखता है। दूर – दूर से लोग यहां आते हैं और छुट्टी का दिन ही इसके लिए सबसे मुफीद है। यहां किसी तरह का प्र‌तिबंध कतई उचित नहीं।
यह मुद्दा ‘आम’ और ‘खास’ के विवाद के रूप में तूल पकड़े, इससे पहले सभी को विश्वास में लेकर आम सहमति से इसका समाधान निकालने की जरूरत है। नहीं तो मुंबई में कई अन्य पर्यटन स्थलों पर भी इस तरह की नौबत आ सकती है।
नाम ही काफी है
मंद-मंद बहती हवा, हलचलों से गुंजायमान सागर किनारा, लंबा-चौड़ा प्रॉमीनेड, उसके छोर पर मौजूद देश का सबसे मशहूर फ्लाईओवर, गुजरते वाहनों के अनवरत रेले और हर ओर पैâला ऐश्वर्य व ग्लैमर। ‌‌एशिया की सबसे विशाल व्यूइंग गैलरी कहलाने वाला मरीन ड्राइव सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा शेयर किया जाने वाला देश का पर्यटक स्थल है – ताजमहल से भी ज्यादा। सप्ताहांतों में यहां १५ लाख सैलानी घूमने आते हैं।
मरीन ड्राइव को मशहूर बनाती है यहां की हर चीज – प्रिंसेज स्ट्रीट से शुरू फ्लाईओवर, जिसका काम १९६४ में शुरू हुआ था। मुंबई का पहला स्काई स्व्रैâपर एयर इंडिया बिल्डिंग। तारापोर एक्वेरियम। पी. जे. हिंदू जिमखाना, मुस्लिम, पारसी, क्रिश्चियन और विल्सन कॉलेज जैसे जिमखाने। विक्टोरिया, भेलपुरी, चंपीवाला, मालिशवाला, चाट। इंडियन एयरफोर्स के एयर शो, इंडियन नेवी की इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू, प्रâेंच फेस्टिवल, योगा बाई द‌ वे और मुंबई इंटरनेशनल मैराथन जैसी भव्य इवेंट्स का ठिकाना। कितने ही कालातीत गीतों और फिल्मों की शूटिंग की जगह। ‘क्वींस नेकलेस’ की एक शोभा दरअसल, इनसे भी बड़ी है – नरीमन पॉइंट से गिरगांव चौपाटी और उससे भी आगे चली गर्इं उसकी खूबसूरत ‘आर्ट डेको’ इमारतें। ओवल ग्राउंड के साथ यह परिसर मियामी (अमेरिका) के बाद विश्व का दूसरा ऐसा क्षेत्र है, जहां समुद्र तट पर अन्य विक्टोरियन गोथिक बिल्डिंग्स् के साथ इतनी बड़ी संख्या में सुंदर आर्ट डेको बिल्डिंग्स् (३९) मौजूद हैं! ओवल प्रेसिंक्ट को यूनेस्को के ‘वर्ल्ड हेरिटेज’ ठिकाने का गौरव इन्हीं इमारतों ने दि‌लाया है।
सबसे महंगा बिजनेस डिस्ट्रिक्ट
सागर की उत्ताल फेनिल तरंगों, ताजा हवा और दूर तक चले गए ताड़ के वृक्षों की संगत में विशाल प्रॉमीनेड पर चहलकदमी करने, सूर्यास्त का मोहक नजारा देखने और चौपाटी की मशहूर भेलपूरी खाने की तफरीहगाह ही नहीं है मरीन ड्राइव। न यह केवल है भीमकाय होर्डिंग्स्, लकदक होटेल्स, पैंâसी कारों और जलती-बुझती नियॉन लाइटों की ऐशगाह। बाबुलनाथ और मलबार हिल को जोड़ने वाली यू शेप्ड यह लोकलिटी देश के मशहूर सिलेब्रिटीज का बसेरा है और देश का सबसे महंगा बिजनेस डिस्ट्रिक्ट।
मरीन ड्राइव पर रहना आज हैसियत और रुतबे का प्रतीक है, पर एक समय इसने ऐसा भी देखा है, जब इन इमारतों को किराए पर उठाना तक मुश्किल था। प्रॉपर्टी के रेट्स यहां आसमान पर चढ़ने शुरू हुए भारत विभाजन के बाद, जब सिंध से आए हिंदू धनिकों ने इसे आबाद किया। २० फुट ऊंची दीवारों और १९६० के दशक में डाले गए टेट्रापॉड से घिरी इस जगह को देखकर आज यह कल्पना करना भी मुश्किल लगता है कि कभी यहां पनचक्की चलती होगी और विकेट गाड़कर बीच सड़क पर क्रिकेट खेला जाता होगा। तब यह गोरे साहब की बग्घी की सरपट सैर का ठिकाना था। शाम गहराते ही लंबा सा डंडा लिए महानगरपालिका का खाकीधारी कर्मचारी आता यहां स्ट्रीट्स पर गैस लाइट्स जलाने। मरीन ड्रॉइव का सबसे शानदार हिस्सा नरीमन पॉइंट जहाजों के लिए बनी गोदी के छोटे से हिस्से को छोड़कर पूरी तरह ही पानी में डूबा होता था। सोनावाला बिल्डिंग के अमीर करीम बताते हैं, ‘जहां आज एनसीपीए है, वहां स्केटिंग रिंक हुआ करती थी।’ प्रेमल लोखंडवाला को दादाजी से सुनी बात याद आ गई, ‘जहां गरवारे क्लब है, वहां कमर तक ऊंची घास थी और हम वहां चोर-पुलिस खेलने जाया करते थे।’ १९०८ से ही यहां बिजली केबल अंडरग्राउंड है और शायद ही कभी बिजली जाती है, पर विश्वयुद्ध के दिनों में यह भी शहर के दूसरे हिस्सों की तरह ‘ब्लैक आउट’ में घिर जाता। क्योंकि अंग्रेजों को डर था कि कहीं समुद्र की ओर से मुंबई पर हमला न हो जाए।
समुद्र के गर्भ से निकला
१९वीं सदी के मध्य में दक्षिण मुंबई का बलुई तट कोलाबा से लेकर वालकेश्वर तक फैला होता था। क्वींस रोड थी ही नहीं। सागर की उत्ताल तरंगें सीधे मरीन लाइंस स्टेशन की दीवारों को पखारा करती थीं। यह पहले सोनापुर और फिर क्वींस रोड के नाम पर ‘क्वींस नेकलेस’ पुकारा जाने लगा। ‘मरीन ड्राइव’ नाम इसे उन मरीन बटालियनों के नाम पर मिला, जिनके बैरेक्स १९वीं सदी में यहां हुआ करते थे। ‘मरीन ड्राइव’ का जन्म हुआ, जब मुंबई के गवर्नर जार्ज लॉयड ने मलबार हिल से कोलाबा के बीच १,००० एकड़ से अधिक समुद्र पाटकर जमीन निकालने की योजना बनाकर इसका काम आरंभ किया। यह काम खत्म हुआ १९२० में। बैकबे के पहले चरण के रिक्लेमेशन के बाद इसके एक हिस्से को नाम मिला वैâनेडी सी फेस – ब्रिटिश सेना के ले. कर्नल सर माइकल कावानाघ वैâनेडी के नाम पर। चौपाटी के प्राणसुखलाल मफतलाल हिंदू स्वीमिंग पूल के बाहर एक लैंपपोस्ट के बाहर एक प्रस्तर पटल पर आपको इसके नाम और निर्माण व समाप्ति तिथि के दर्शन होंगे। यह मुंबई की पहली आरसीसी सड़क है, जिसका निर्माण उद्योगपति पालोनजी मिस्त्री और भागोजी शेठ कीर ने करवाया। नरीमन पॉइंट और कफ परेड के जन्म के लिए बैकबे के अन्य रिक्लेमेशंस को जिम्मेदार माना जाता है, जो १९६० के दशक की देन हैं। मरीन ड्रॉइव अब निखार पर है। जल्द ही आप यहां देश के पहले सी – साइड प्लाजा और व्यूइंग गैलरियों से समुद्र की लहरों की अठखेलियां देखेंगे।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

अन्य समाचार