मुख्यपृष्ठस्तंभसंडे स्तंभ : मुंबई के ये शांतिनिकेतन!

संडे स्तंभ : मुंबई के ये शांतिनिकेतन!

विमल मिश्र

इन विद्यार्थियों में ज्यादातर को महंगे स्कूल-कॉलेज या कोचिंग की सुविधा हासिल नहीं हुई है, न ही मुहैया है। शोर-शराबे और डिस्टर्बेंस से दूर-किसी एकांत कोने में पढ़ने-लिखने और परीक्षा की तैयारी करने की सहूलियत। मुंबई के रेल स्टेशन, बस स्टॉप, फुटपाथ, गलियों, बीच, पार्क, यहां तक कि पाइपलाइनों के ऊपर पढ़ाई करना उनके लिए मजबूरी है। शहर के वंचित  और गरीब विद्यार्थियों के शांतिनिकेतन यही हैं।

स्टेशन का इंडिकेटर घड़ी है, चर्चगेट लोकल अलॉर्म बेल, प्लेटफॉर्म नंबर सात की एक बेंच टीचर की टेबल-कुर्सी और दरी बिछा प्लेटफॉर्म क्लासरूम। यह वह स्कूल है, जो अंधेरी स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर सात पर रोज दिन में १.०९ बजे लगता है। इस स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं फुटपाथी और आस-पास की झोपड़ियों में रहने वाले गरीब मजदूरों के बच्चे। यही उनकी अभ्यास गलियां हैं और यही उनका शांतिनिकेतन।
स्टेशनों और फ्लाईओवरों की पाठशालाएं
चर्चगेट, दादर, बांद्रा, विले पार्ले और अंधेरी जैसे स्टेशनों पर ‘एनजीओ वॉयस-वॉलंटरी ऑर्गनाइजेशन इन कम्यूनिटी इंटरप्राइज’ अपनी ये पाठशालाएं पिछले कई सालों से चला रहा है। इन पाठशालाओं के स्टूडेंट हैं कंधों पर हार्मोनियम, हाथों में बूट पॉलिश का बस्ता और छोटे-मोटे सामान लिए नन्हें हॉकर, अमूमन स्टेशनों के प्लेटफार्म ही जिनके घर हुआ करते हैं। इन बच्चों को यूनिफार्म, स्कूल बैग या टिफिन बॉक्स की कोई सुविधा हासिल नहीं। स्टेशनों के कंक्रीट बेंच उनकी टीचर दीदी की कुर्सी है, घड़ी है प्लेटफॉर्म के इंडिकेटर और स्कूल बेंच पिलर। एनजीओ आशा किरण भी अंधेरी और आस- पास के पांच स्थानों पर रेलवे प्लेटफॉर्मों, बस स्टाप्स और फुटपाथों पर ऐसी कक्षाएं लगा रहा है। माहिम स्टेशन के ठीक बाहर एनजीओ आल्टनेटिव रियलिटीज के वॉलंटियर रोजाना झुग्गियों के बच्चों के लिए म्यूजिक की क्लास लगाते हैं। मुंब्रा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर रोज दो घंटे लगने वाली क्लास की प्रायोजक खुद ठाणे महानगरपालिका ही है। रे रोड स्टेशन पर देर रात जब ट्रेनों का शोर खामोश हो जाता है, रेल पटरियां ही उनके पढ़ने का स्थान बन जाती हैं।
‘तेल के पैसों के अभाव में रातों में जब घर का दिया बुझ जाता तो चौपाटी पर जंजीरा मोटर वर्क्स के पास एक सीमेंट की बेंच पर बैठकर मैं स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ाई किया करता। सेंट्रल रेलवे पर तब आखिरी ट्रेन रात १० बजे छूटा करती थी। मैंने रात दो-दो बजे तक कई रातें इन प्लेटफॉर्मों पर बिताई हैं’, सीएआईआर के पूर्व डॉयरेक्टर जनरल पद्मभूषण आर. ए. माशेलकर संघर्ष के दिनों की यादों में डूबे हुए थे। मुंबई की अभ्यास गलियों ने माशेलकर ही नहीं, ऐसे कितने ही रत्न दिए हैं।
अभ्यास गलियों के रतजगे
परीक्षा के दिनों में वर्ली में दूरदर्शन के सामने और पोद्दार अस्पताल के पीछे वृक्षों से घिरी ‘अभ्यास गली’ (सुदाम काली अहिर मार्ग) अनिल पंड्या ही नहीं, उनके दोनों भाई, पिता तक के रतजगों की साक्षी हैं। पास की बी. डी. डी. व अन्य चॉलों के मजदूर घरों के बच्चों के लिए मुंहमांगी मुराद से कम नहीं। इस गली की विशेषता है स्टाइलिश लेड लाइट्स, करीने से लगीं आरामदायक बेंचें और प्रेरक वाक्य लिखी रंग-बिरंगी पेंटिंग लगी खुशनुमा दीवारें, जो मुंबई एनिशिएटिव नामक कला संस्था के प्रयासों की देन हैं। मुंबई महानगरपालिका के प्रयासों से अब यह बाइक रेसर्स और नशाखोरों से भी मुक्त हो गई है। अभ्यास गली की रौनक कम होती है, आधी रात के बाद आत्महत्या कर लेने वाले पोद्दार हॉस्पिटल के एक डॉक्टर के ‘भूत’ की अफवाह से। दीगर बात है कि ग्रांट रोड का सुन्नी मुस्लिम छोटा कब्रिस्तान अब दफन के लिए कम, पढ़ाकू बच्चों के लिए ज्यादा जाना जाता है।
पेड़ की ठंडी छांव में रिवीजन में खोई खुशबू गिरीश ठाकर को खींच लाई है इस पार्क की निस्तब्ध शांति। सागर की लहरों का शोर और गिरगांव चौपाटी से उठी मंद बयार में यहां पढ़ाई का मूड बनाने की कुछ खास जरूरत नहीं होती। चर्नी रोड स्टेशन के ठीक आगे, बाल भवन से बिलकुल सटा यह पार्क पढ़ाकू छात्राओं का मुख्य अड्डा है। महिलाओं के लिए रिजर्व यह पार्क दोपहरों में खासकर गुलजार होता है। ‘यहां पढ़ने आने वाली लड़कियों की सुरक्षा, और उन्हें कोई डिस्टर्ब न करे, मेरा पहला काम है’, पार्क के वाचमैन सरजू प्रसाद बताते हैं। अगस्त क्रांति मैदान, ओवल मैदान और सायन का जवाहरलाल नेहरू उद्यान ऐसे दूसरे पार्क हैं। पार्क ही नहीं, मरीन ड्राइव और कार्टर रोड के पैरापेट, चौपाटी के बलुई तट, वर्ली गांव की बिल्डिंग्स की छतें, यहां तक कि महाकाली केव्ज के भीतर भी आपको स्टुडेंट्स के कई ग्रुप किताबों में माथा घुसाये मिल जाएंगे।
फोर्ट परिसर में एशियाटिक सोसायटी की ऊंची चक्करदार सीढ़ियां परीक्षा ही नहीं, आम दिनों में भी स्टुडेंट्स को लुभाती हैं। एशियाटिक सोसायटी के सामने वाला पार्क रात आठ बजे तक इन अभ्यासियों के लिए भरा रहता है। ‘यहां आने वाले ९० प्रतिशत सीरियस स्टुडेंट हैं, बाकी १० प्रतिशत मजे लेने आते हैं’, नेवी के सेलर टी. आर. छेत्री बताते हैं। इन गलियों के ज्यादातर पढ़ाकुओं की चाहत है कि बीएमसी उन्हें नाइट स्डडी के लिए अपने स्कूलों में क्लास रूम्स की सुविधा मुहैया कराए। सुरक्षा के लिहाज से, खासकर बरसात के दिनों में।
चर्चगेट पर होटल एंबेसडर के करीब पास की दूकानों से झरती मंद-मंद रोशनी में पुराने अखबार बिछाकर बैठे किसी बच्चे का चेहरा आस-पास के लोगों के लिए अपरिचित नहीं। अमूमन ये वही बच्चे हैं जो हाथ पकड़कर आपसे फूल से लेकर मैगजीन तक खरीदने की मनुहार किया करते हैं। यह है ‘हमारा फुटपाथ’ का नाइट क्लास, जिसकी संस्थापक हैं अखिल भंडारी, सुभांगी स्वरूप और नुपुर शाह। वेस्टर्न एक्प्रेस हाइवे की एक झोपड़ी में रहने वाले कुमार पिल्लई इन्हीं पढ़ाकुओं में से हैं। शिवड़ी-कोलीबाड़ा की सबा खान घर के बिलकुल बाहर खुले में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर है।
शाहीन मिस्त्री के आकांक्षा फाउंडेशन की ७० से ज्यादा क्लासों के तो ज्यादातर बच्चे बिल्डिंग मजदूरों के नौनिहाल हैं। कांदिवली की २४ वर्षीया हेमंती सेन की इन कक्षाओं का एकमात्र लक्ष्य है इन नौनिहालों को पढ़ा-लिखा कर समाज की मुख्य धारा में शामिल करना। उनके इन बच्चों में ज्यादातर भीख मांगने वाले बच्चे हैं।
परीक्षाओं के मौसम में शहर के कुछ फ्लाईओवर भी इन परीक्षार्थियों के पॉपुलर ठिकाने बन जाते हैं। कांदिवली, बोरिवली और मागाठाणे के स्कॉईवॉक पर विले पार्ले के नरसी मूनजी कॉलेज के छात्र रोजाना दो घंटे आकर आस-पास रहने वाले और मजदूरी करने वाले बच्चों को पढ़ाते हैं। माहिम की पाइपलाइन इन बच्चों की अन्य अभ्यासशाला है।

(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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