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झांकी: बहूजी की टेंशन

अजय भट्टाचार्य

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की गोविंदपुरा सीट भाजपा की सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है। बाबूलाल गौर ९ बार यहां से विधायक रहे। २०१८ से अब इस सीट पर उनकी बहू कृष्णा गौर ने मोर्चा संभाल रखा है। मतदान के बाद पूर्व मुख्यमंत्री की बहू और विधायक मैडम इस बार टेंशन में है। टेंशन की वजह है मैडम के पास उनके इलाके से पहुंच रहा निगेटिव फीडबैक। मैडम को पता चल रहा है कि उनकी स्थिति ठीक नहीं है और नतीजे उनकी आशा के विपरीत भी आ सकते हैं। उनके क्षेत्र में लोग उनकी कम सक्रियता की वजह से जबरदस्त आक्रोश में हैं। वैसे मैडम जिस सीट से चुनाव लड़ रही हैं, वो भाजपा की प्रदेश की सबसे सुरक्षित सीट में से एक है। यहां से मैडम के ससुर नौ बार विधायक रहे। इसके बाद मैडम खुद विधायक बनी। यहां कभी कांग्रेस नहीं जीती है। इसी अति आत्मविश्वास के कारण मैडम ने प्रचार-प्रसार में भी ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई। अब मैडम को डर लग रहा है कि यदि वे चुनाव हारी तो उनकी राजनीति की नैया डूब जाएगी। वैसे भी पहली सूची में नाम न आने के बाद बहूजी ने टिकट न मिलने की स्थिति में निर्दलीय लड़ने की हुंकार भरी थी। टिकट कन्फर्म हुआ तो चिरविजयी सीट मानकर मेहनत नहीं की।

सूची बन रही

बात २००७ की है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव चल रहे थे और बसपा सुप्रीमो बहनजी धुआंधार प्रचार में जुटी थीं। एक जगह जिले के बड़े पुलिस अफसर ने उनकी चुनावी सभा में अड़ंगेबाजी की, तब बहनजी ने मंच से अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि अमुक अफसर का नाम लिखकर मुझे दो, चुनाव के बाद इसको सबक सिखाऊंगी। मायावती की सरकार बनते ही उस पुलिस अफसर के बुरे दिन शुरू हो गए। खबर है कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का प्रदेश के कुछ अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली को लेकर गुस्सा सातवें आसमान पर है। उनका मानना है कि कुछ अधिकारी-कर्मचारियों ने भाजपा के बूथ एजेंट की तरह चुनाव में काम किया है। अब ३ दिसंबर को नतीजे आने हैं। इस बीच के खाली वक्त में वे ऐसे अधिकारी-कर्मचारियों की सूची तैयार करने में जुट गए हैं, जिन्होंने भाजपा कार्यकर्ता बनकर काम किया है। उन्होंने अपनी पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों से भी ऐसे अधिकारियों के नाम मांगे हैं, ताकि सरकार बनने के बाद इनके खिलाफ वे कार्रवाई कर सकें। सरकार आ गई तो ठीक, लेकिन यदि सरकार नहीं आई तो यह सूची किसी फाइल में दबकर रह जाएगी। जिस तरह के फीडबैक आ रहे हैं, उसे देखते हुए कई अफसर अभी से पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले की परिक्रमा करने लगे हैं। अफसरों की इस परिक्रमा से मामाजी की टेंशन और ज्यादा बढ़ गई है। शायद इसीलिए मुख्यमंत्री के सरकारी आवास से अलग एक बंगले का रंग-रोगन शुरू हो चुका है, ताकि घर बदलने में देर न लगे।

मिलन की आस

मालवा की कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की हसरत अधूरी रह गई। पूर्व मंत्री ने मनावर विधानसभा सीट से टिकट मांगा था। भाजपा ने शिवराम गोपाल कन्नौज को अपना प्रत्याशी बनाया। इसके बाद उन्होंने भाजपा और इंदौर के वैâलाश विजयवर्गीय पर जमकर निशाना साधा था। खुलेआम बोलीं कि इंदौरी नेताओं ने यहां बिच्छू पैदा किए हैं। उन्होंने भाजपा द्वारा कई हारे हुए वरिष्ठ नेताओं को फिर से टिकट दिए जाने का मुद्दा उठाते हुए फिर से उनके आदिवासी होने के नाते टिकट काटने और दोहरापन अपनाने की बात कही थी। यह देवीजी मोदी से मुलाकात कर लोकसभा चुनाव में टिकट की गारंटी चाह रही थीं। दरअसल, देवीजी की विधानसभा टिकट इस बार भाजपा ने काटकर उनके एक रिश्तेदार को दे दी। इस पर देवीजी अत्यंत क्रोध की मुद्रा में आ गर्इं और निर्दलीय चुनाव में कूदने का एलान कर दिया। नाराजगी शांत करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इनसे मुलाकात की, लेकिन देवीजी ने मोदी से ही मुलाकात की जिद पकड़ ली। पिछले दिनों एक भारी-भरकम नेता के प्रचारार्थ जब मोदी इनकी विधानसभा में प्रचार करने आए तो जोड़-तोड़कर मंच संचालन के बहाने मंच पर पहुंच गर्इं, लेकिन जैसे ही मोदी मंच पर आए सुरक्षाकर्मियों ने इन्हें वहां से उतार दिया। इसके बाद देवीजी की मोदी से मुलाकात सपना बनकर रह गई। जिस नेता के पक्ष में मोदी ने वोट मांगे, उसकी खुद की सीट फंसी हुई है। राष्ट्रीय स्तर के नेताजी अगर इंदौर में निपट गए तो भद्द पिट जाएगी।

 

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