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झांकी : ललन बाहर

अजय भट्टाचार्य

जदयू की नई घोषित राष्ट्रीय कार्यसमिति में राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिश कुमार के साथ २२ पदाधिकारी बनाए गए हैं। इनमें एक उपाध्यक्ष, एक सलाहकार सह प्रवक्ता, एक कोषाध्यक्ष, ११ महासचिव, छह सचिव और एक प्रवक्ता को शामिल किया गया है। नीतिश कुमार पिछले साल २९ दिसंबर को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। उनके अध्यक्ष बनने के तीन सप्ताह बाद ही नई कमेटी बना दी गई है। नई टीम में राज्यसभा सांसद तथा पार्टी के वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह को राष्ट्रीय कमेटी में पहली बार शामिल करते हुए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा केसी त्यागी को राजनीतिक सलाहकार सह राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता बनाया गया है। पूर्व विधायक राजीव रंजन पहले की ही तरह राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेवारी संभालेंगे। कार्यसमिति में राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर, पमंगनी लाल मंडल, जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा, मोहम्मद अली अशरफ फातमी, विधानपार्षद आफाक अहमद खान, श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, रामसेवक सिंह, कहकशां परवीन, विधानपार्षद कपिल हरिश्चंद्र पाटिल, राज सिंह मान, सुनील कुमार उर्फ इंजीनियर सुनील सहित ११ महासचिव बनाए गए हैं। विद्या सागर निषाद, राजीव रंजन प्रसाद, अनूप पटेल, दयानंद राय, संजय कुमार और मो. निसार को सचिव तथा सांसद आलोक कुमार सुमन को फिर कोषाध्यक्ष बनाया गया है। हां, इस सूची में पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह गायब हैं।
कामचलाऊ शिखर
व्हॉट्सऐप गुरुकुल से दीक्षित सड़क छाप ज्ञानीजन चाहें जो कुछ कहें, लेकिन उनके महाप्रभु को समझ आ गया है कि बिना शिखर के मंदिर का लोकार्पण उचित नहीं इसलिए पत्थर के मंदिर में कपड़े और लकड़ी के शिखर बनाने का कार्य हो रहा है, ताकि कोई यह न कह सके कि मंदिर में शिखर नहीं था। यह और बात है कि अहंकारी सोच के अनुसार बन रहे कृत्रिम शिखर प्राण प्रतिष्ठा के बाद में तोड़ दिए जाएं। महाप्रभु अगर एक काम को तीन बार न करें तो फिर किस बात के विश्वगुरु? आग्नेय महापुराण के अनुसार, ‘प्रसादो वासुदेवस्य मूर्त रूपों निबोधमे’ अर्थात भगवान का मंदिर भी भगवान की प्रतिमा ही है। विश्वामित्र संहिता, नारद संहिता, विष्णु संहिता में भी मंदिर के पूरे निर्माण को भगवान की प्रतिमा के रूप में देखा गया है। प्रतिष्ठा मयूख के अनुसार मंदिर की पादशिला देवता के चरण, गर्भगृह पेट, खंभे देव भुजाएं, र्इंटें अस्थियां, खिड़कियां कान, कलश देवता का सिर, शिखर देवता का नेत्र और ध्वजा को देवता का केश बताया गया है। इनके बिना बना मंदिर बिना सिर, चेहरे की मूर्ति के समान है इसीलिए पूरे देव प्रतिमा के साथ-साथ पूरे मंदिर का अभिषेक किया जाता है। द्वार प्रतिष्ठा की जाती है और शिखर पर कलश व ध्वजा स्थापित की जाती है।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार-
अतो ध्वजस्य विन्यास: कर्तव्य पृथ्वीपते:।
असुरावास मिच्छ्यन्ति ध्वजहीने सुरालये।।
अर्थात मंदिर में ध्वजा को स्थापित करना ही चाहिए, क्योंकि ध्वजाविहीन मंदिर में राक्षसों का वास होता है। जब शंकराचार्य ने शास्त्र सम्मत बयान दिया कि बिना शिखर प्रतिष्ठा नही हो सकती, तब सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्म गुरु को राम विरोधी बताने का प्रयास किया गया। बिना शिखर प्रतिष्ठा हो सकती है ऐसा कुछ चंडू टाइप के ज्योतिष एवं चंदाजीवी कर्मकांडी पंडों का नाम लेकर कागज घुमाए गए! सियासी शहंशाह सर्वोच्च शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन धर्म के मामले में और उससे संबंधित ज्ञान के मामले में शंकराचार्यों के आगे शून्य है।
केशरिया सेवा
तस्वीर में विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के मुख्य यजमान डॉ. अनिल मिश्रा को जो चीज भेंट कर रहे हैं व कश्मीर के मुसलमानों द्वारा रामलला की सेवा में भेजी गई दो किलो केशर है। साथ ही उन मुसलमानों ने यह संदेश भी भेजा कि कि हमारा मजहब अलग है, लेकिन हमारे पुरखे एक हैं। राम हमारे सबसे आदरणीय पूर्वज हैं। कश्मीर के लोगों ने कामना की है कि इस केसर का इस्तेमाल रामलला के तिलक या अन्य अनुष्ठान में हो। आलोक कुमार ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि सभी के लिए रामलला के दरवाजे खुले हैं। प्रभु राम न केवल हिंदू धर्म में पूजनीय हैं, बल्कि सभी के साझा पूर्वज हैं। उन्होंने मुसलमानों से इस साझा विरासत के प्रति अपना सम्मान बढ़ाने का आग्रह किया, जबकि इसके विपरीत एक बिरादरी मुगलों से बदला लेने पर आमादा है।

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