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झांकी : मिस्टर ४० परसेंट

अजय भट्टाचार्य

किसी भी राज्य में राजस्व विभाग को कमाऊ विभाग कहा जाता है। गुजरात का `कमाऊ’ विभाग काम के बदले भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात हो गया है। एक पूर्व उच्च-रैंकिंग अधिकारी की पहचान ही मिस्टर ४० परसेंट के नाम से होती थी, जो किसी काम या परियोजना अनुमोदन की सुविधा के लिए ४० प्रतिशत कटौती की मांग करने के लिए कुख्यात थे। बात पैâल गई, जिससे उनकी नियुक्ति एक अगोचर विभाग में कर दी गई। उनके उत्तराधिकारी ने यथास्थिति को बदलने के लिए कुछ नहीं किया, क्योंकि उन्होंने काम में तेजी लाने के लिए बिचौलियों के माध्यम से ३५ प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग जारी रखी। यह प्रतिष्ठा कनिष्ठ अधिकारियों और विभाग के कर्मचारियों के बीच काफी असुविधा पैदा कर रही है। क्या उच्च अधिकारी ३५ प्रतिशत मांग से अनभिज्ञ हैं, या वे अनसुना कर रहे हैं?

सिख बिदके
राजस्थान की तिजारा विधानसभा सीट पर भाजपा ने अल्सर के सांसद महंत बालकनाथ को टिकट देकर चुनाव में उतारा है और उनकी ब्रांडिंग राजस्थान के योगी के रूप में की जा रही है। चार दिन पहले बालकनाथ ने अपना नामांकन भरा था। इस मौके पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी आए थे। इस दौरान आयोजित नामांकन रैली में संदीप दायमा ने सिख समुदाय के धार्मिक स्थल गुरुद्वारों को लेकर विवादित बयान दे दिया, जिससे सिख बिदके हुए हैं। जब सिख संगठनों ने दायमा की इस बयान के मुद्दे पर भाजपा को लपेटना शुरू किया, तब दायमा ने सिख समुदाय से माफी भी मांगते हुए भिवाड़ी स्थित गुरुद्वारे में जाकर सेवा की। लेकिन पार्टी ने सिख समुदाय की नाराजगी को देखते हुए दायमा को चुनाव से पहले ही निष्कासित कर दिया। संदीप दायमा पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी से प्रत्याशी थे, लेकिन वे चुनाव हार गए थे। भाजपा ने इस बार तिजारा से अलवर सांसद बाबा बालकनाथ को चुनाव मैदान में उतारा है। वैसे भी बालकनाथ को बाहरी उम्मीदवार बताकर स्थानीय नेतृत्व पहले से ही बिफरा हुआ था। अब दायमा सिखों पर बयान देकर और गुड का गोबर कर बैठे। पार्टी में रहकर भी बैंड बजाने की यह नई प्रयोगशाला के पहले झंडाबरदार बने दायमा को अच्छी तरह पता था कि उनके इस बयान के बाद महंत जी भरतनाट्यम करने लगेंगे। महंतजी भी जानते हैं कि हारे तो लोकसभा की उम्मीदवारी पर भी तलवार लटक जाएगी। पार्टी ने दायमा को भले निकाल दिया हो, मगर दायमा पार्टी का जो नुकसान करना चाहते थे वह कर गए।

बात विंध्य की
विंध्य क्षेत्र पारंपरिक रूप से विंध्याचल पर्वत के आस-पास का पठारी भाग माना जाता है। विंध्य प्रदेश में १९५२ में पहली बार विधानसभा का गठन भी हुआ था। विंध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित शंभुनाथ शुक्ला थे, जो शहडोल के रहनेवाले थे। १ नवंबर १९५६ को मध्य प्रदेश का गठन हुआ था। इसके बाद से विंध्य को अलग प्रदेश बनाए जाने की मांग उठने लगी थी। विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी भी अलग प्रदेश बनाए जाने के पक्षधर थे। तिवारी ने विंध्य प्रदेश की मांग को लेकर विधानसभा में एक राजनीतिक प्रस्ताव भी रखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र को मिलाकर अलग विंध्य प्रदेश बनाया जाना चाहिए। हालांकि, इस मुद्दे पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई और बात आई-गई हो गई, लेकिन विधानसभा में प्रस्ताव आने के बाद कभी-कभी यह मांग दोबारा उठती रही। कई बार छोटे-मोटे आंदोलन भी हुए। सन २००० में केंद्र की भाजपा नीत राजग सरकार ने झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड प्रदेश बनाने के गठन को स्वीकृति दी थी। उस समय भी श्रीनिवास तिवारी के पुत्र दिवंगत सुंदरलाल तिवारी ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर एक बार फिर मुद्दा गर्मा दिया था। मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने विधानसभा से एक संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, लेकिन तब केंद्र ने इसे खारिज कर केवल छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना को हरी झंडी दे दी थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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