मुख्यपृष्ठस्तंभझांकी: भाई-भाई के खेल में ट्विस्ट, भाई की भाईगिरी से परेशान मंत्री

झांकी: भाई-भाई के खेल में ट्विस्ट, भाई की भाईगिरी से परेशान मंत्री

अजय भट्टाचार्य

नर्मदा किनारे बसे एक जिले की विधानसभा सीट से कांग्रेस-भाजपा ने दो सगे भाइयों को चुनाव में उतारा। उस वक्त कयास लगाए जा रहे थे कि विधायकी घर में ही रहेगी, लेकिन एक निर्दलीय ने खेल बिगाड़ दिया। यह स्थिति भांपकर भाजपाई खेमे से अफवाह उड़ा दी गई कि कांग्रेस के प्रत्याशी ने अपने भाई और भाजपा प्रत्याशी को अंदरूनी तौर पर समर्थन दे दिया है। नतीजा यह हुआ कि निर्दलीय उम्मीदवार के साथ-साथ कांग्रेस की टिकट पर लड़ रहे भाई भी जोश में आ गए और चुनाव प्रचार को ऐसी धार दी कि अब विधायक जी के चेहरे की चमक गायब है। मतगणना के इंतजार का एक-एक पल विधायकजी को लंबे अरसे का अहसास करा रहा है। हालांकि, स्थिति अब भी आसान नहीं है। भाजपा और निर्दलीय उम्मीदवार के बीच कड़ी टक्कर वाली अफवाह दम तोड़ती नजर आ रही है। इसके उलट विधायकजी को यह डर सता रहा है कि कहीं तीसरे नंबर पर न खिसक जाएं।

भाई की भाईगिरी से परेशान मंत्री

कल तेलंगाना में मतदान के बाद अब देश को ३ दिसंबर को आने वाले नतीजों का इंतजार है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल इलाके के एक कद्दावर मंत्री की नींद उड़ी हुई है। वे अक्सर खुद को मुख्यमंत्री पद की दौड़ का हिस्सा भी बताते रहे हैं। वे मंत्रीजी इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार से कड़ा संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। एक-एक वोट के लिए मिन्नतें करते नजर आए मंत्रीजी का चुनावी गणित उनकी ही पार्टी से आने वाले एक सजातीय नेता जी ने निर्दलीय के तौर पर मैदान में कूदकर बिगाड़ दिया। इससे चुनाव में मंत्रीजी की स्थिति और खराब हो गई। इस बागी ने मंत्रीजी के भाई की भाईगिरी का मुद्दा पूरे चुनाव अभियान में उठाया। बताया जाता है कि इलाके के लोग मंत्रीजी से तो इतने ज्यादा नाराज नहीं थे, जितने उनके भाई के व्यवहार से थे। उनके भाई के भय और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यकर्ता से लेकर जनता तक नाराज है। हालांकि, मंत्रीजी ने चुनाव जीतने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। अब नतीजों के लिए तो ३ दिसंबर तक का इंतजार करना होगा।

चोर धरो, जेल भरो

कलकत्ता उच्च न्यायालय से हरी झंडी मिलने के बाद परसों धरमतला में बंगाल भाजपा ने अमित शाह की मौजूदगी में जन्मभूमि मंदिर के रथ पर सवार ‘चोर धरो जेल भरो’ नारे के साथ लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया। मंच पर आते ही शाह ने सवाल दागा, ‘क्या अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए?’ भीड़ से जवाब आया ‘हां’ और इसके साथ ही शाह शुरू हो गए कि कांग्रेस के साथ मिलकर ममता बनर्जी ने भी मंदिर निर्माण में बाधा डाली थी। मोदी जी ने मंदिर निर्माण के सपने को वास्तविकता में बदल दिया, २२ जनवरी को मंदिर का उद्घाटन होगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या राम मंदिर मोदी के कहने पर बन रहा है या सर्वाेच्च न्यायालय के पैâसले के बाद बन रहा है? दूसरा यह कि इस मंदिर की अदालती लड़ाई में मोदी, शाह सहित उनकी पार्टी भाजपा खिन्न दिखी थी क्या? राम जन्मभूमि मामले में हिंदुओं की तरफ से मुख्य पक्षकार रामलला विराजमान और निर्माेही अखाड़ा थे। मंदिर के लिए आंदोलन करने वाली विश्व हिंदू परिषद भी अदालत नहीं गई थी। सबसे प्रमुख बात यह कि जब बाबरी मस्जिद ढह गई, तब भाजपा नेता उसकी जिम्मेदारी लेने से बचते नजर आए थे। सिर्फ शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने खुलकर स्वीकार किया था कि मस्जिद का गुंबद शिवसैनिकों ने ढहाया है, तो इसका हमें गर्व है। वस्तुत: शाह अपनी पार्टी के पितृ संगठन की नीतियों को ही आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका देश के स्वतंत्रता संग्राम में शून्य योगदान था और अब यह कुनबा स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधाओं को झूठ के आधार पर खारिज करने पर लगी है।

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