मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का: सजा का ‘एक दिन’

तड़का: सजा का ‘एक दिन’

कविता श्रीवास्तव
केवल एक दिन की सजा भी सजा ही मानी जाती है। लेकिन सजा केवल एक दिन कम कर दी जाए तो क्या हो सकता है, यह राहुल गांधी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बताया है। गुजरात की अदालत ने राहुल गांधी को दो साल की सजा दी। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगाई है। इससे उनकी संसद सदस्यता बहाल हो गई है। वे पुन: लोकसभा पहुंच गए हैं, लेकिन इससे यह स्पष्ट हुआ कि हमारे संविधान के प्रावधान कितने सुदृढ़ हैं। वे मूलभूत अधिकारों का हनन होने पर नागरिकों की ढाल बन जाते हैं। राहुल गांधी को एक सरनेम पर टिप्पणी के कारण सजा मिली थी। सजा के आधार पर उनकी संसद सदस्यता छीनी गई थी। लेकिन वे भी नरेंद्र मोदी, अमित शाह व अन्य की तरह जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के पैâसले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मानहानि के मामले में अधिकतम सजा ही दो साल है। राहुल गांधी को अधिकतम सजा क्यों दी गई, इसका कारण नहीं बताया गया। उनके खिलाफ मामला गैरसंज्ञेय, जमानती और समझौता योग्य था। उनकी सजा यदि एक दिन भी कम होती तो उनकी संसद सदस्यता नहीं जाती। क्योंकि दो साल की सजा पाने वाले जनप्रतिनिधियों की सदस्यता छीनी जा सकती है। सजा उससे एक दिन भी कम है तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी की सदस्यता छीना जाना उस जनता को भी प्रभावित करता है, जिसने उन्हें चुना है, जिनके वे जनप्रतिनिधि हैं। सुप्रीम कोर्ट की राहत से राहुल गांधी का राजनीतिक सफर बाधित होने से बच गया। यदि उन्हें राहत नहीं मिलती तो इस सजा के कारण सार्वजनिक जीवन में बने रहने का उनका अधिकार प्रभावित होता। उन्हें अगले चुनाव में भी मौका नहीं मिलता। वे कई वर्षों तक सार्वजनिक जीवन से बेदखल हो जाते। गौरतलब है कि राजनीति में नेताओं की टिप्पणियों पर अक्सर विवाद होते हैं। हालांकि, वे हमेशा इरादतन ऐसा नहीं बोलते। लेकिन फिर भी वे आपत्तिजनक तो होते ही हैं। इससे बचना चाहिए और गलती होने पर तुरंत माफी मांगनी चाहिए। क्योंकि हमारे संविधान में सभी नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रावधान हैं। उन्हीं के आधार पर गलती करने वाले के इरादे का आकलन होता है और सुधार के उपाय किए जाते हैं। राहुल गांधी को मिली राहत का मूल तत्व यही है। यही तो हमारे देश के संविधान और लोकतंत्र की खूबसूरती है!

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