मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : मुद्दों की खिचड़ी

तड़का : मुद्दों की खिचड़ी

कविता श्रीवास्तव

इन दिनों चुनाव है इसलिए राजनीति में आजकल क्या खिचड़ी पकड़ रही है समझ ही नहीं आता है। हम तो बचपन से यही जानते हैं कि खिचड़ी बहुत ही प्रचलित और लोकप्रिय व्यंजन है, लेकिन यह भी सही है कि खिचड़ी के संमिश्रण की कोई सीमा नहीं है। वैसे अरहर की दाल और चावल से बनी सादी खिचड़ी सबसे मजेदार होती है। चावल के साथ अरहर की दाल की जगह हरे मटर, मूंग, उड़द आदि कोई भी दलहन मिलाकर खिचड़ी बनाई जा सकती है। सब्जियों का इस्तेमाल भी खिचड़ी में हो सकता है। पालक खिचड़ी भी स्वास्थ्यवर्धक और सुपाच्य समझी जाती है। खिचड़ी के साथ प्याज, हरी मिर्च, सलाद, दही, रायता, अचार और अन्य कई चीजें चल जाती हैं। खिचड़ी नमक वाली होती है, लेकिन मीठी भी बनाई जा सकती है। बनाने वाले तो मटन या चिकन खिचड़ी भी बना लेते हैं। खिचड़ी छोड़िए साहब खिचड़ा भी बनाया जाता है। है न कमाल की बात। खिचड़ी में वेरायटी के इतने विकल्प हैं कि दूसरा कोई इसका मुकाबला नहीं कर सकता है। अब ज्यादा बताने लगूं तो संभव है, खिचड़ी खाने का मन हो जाए इसलिए मुद्दे पर आते हैं। मुद्दे यानी वे मुद्दे जो चुनावों में राजनेताओं द्वारा मंचों से उठाए जाते हैं। जी हां, जनसमस्याओं के मुद्दे, राष्ट्र के विकास के मुद्दे, नागरिकों के हितों के मुद्दे राजनेता उठाएंगे और राहत की योजनाएं प्रस्तुत करेंगे, यही अभिलाषा रहती है। विपक्षी दलों की ओर से संसद में और संसद के बाहर भी महंगाई पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इन दिनों चुनावी रैलियां में भी विपक्ष महंगाई और बेरोजगारी को लेकर आक्रामक है, लेकिन सत्ता पक्ष चूं तक नहीं कर रहा। सबसे अफसोस की बात यह है कि टीवी चैनल, मीडिया और तमाम प्रसार माध्यमों ने भी महंगाई को महत्व ही नहीं दिया है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को संतुलित बनाए रखने के लिए उसकी महंगाई दर को भी नियंत्रित रखना आवश्यक है। हमारे देश में सामाजिक विसंगतियों के मद्देनजर यह अत्यंत ही आवश्यक है, क्योंकि हमारे यहां जो गरीब हैं, वे निरंतर गरीब होते जा रहे हैं। अमीर तबका निरंतर अमीर होता जा रहा है और यह बीच की खाई पाटने में हमारी सरकारें विफल हैं।

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