मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : बुजुर्गों का सहारा बनें

तड़का : बुजुर्गों का सहारा बनें

कविता श्रीवास्तव

कोल्हापुर में हातकणंगले तालुका के माणगांव ग्राम पंचायत ने निर्णय किया है कि वह उन घरों की जलापूर्ति रोक देगा, जहां लोग घर के बुजुर्गों की देखभाल नहीं करते हैं। हालांकि, नियमानुसार ऐसा तभी संभव है जब पानी का बिल नहीं भरा जाए। लेकिन यह भी संवैधानिक प्रावधान है कि जिन माता-पिता ने अपने मेहनत की सारी कमाई अपने बच्चों को पालने, पढ़ाने-लिखाने, उन्हें बड़ा करने में लगाई है, आगे चलकर उन बच्चों की कमाई पर उनका भी हक बनता है। यह नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी न्यायसंगत है। यह बच्चों की जिम्मेदारी भी है। लेकिन अक्सर ऐसी खबरें आती हैं जहां बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता का ख्याल नहीं रखते। उन्हें लावारिस छोड़ देते हैं। उम्र की जर्जर अवस्था में पहुंचे माता-पिता बिल्कुल असहाय होते हैं। उनकी कातर आंखें हमेशा अपने बच्चों की ओर ही देखती हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी गोद में उठाकर हमेशा फूलों की तरह संभाला। अपने हिस्से की हर चीज उस बच्चे की परवरिश में खर्च कर दी, यह सोच कर कि कल बुजुर्गावस्था में उनके अपने बच्चे ही तो सहारा बनेंगे। फिर भी कई स्थानों पर हमने वृद्धाआश्रम देखे हैं, जहां लोग अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़ आते हैं। हमारी मुंबई में ही ऐसे ढेर सारे वृद्धाश्रम मौजूद हैं। वे क्यों हैं? क्या माता-पिता हमारे लिए बोझ हैं? हमारी संस्कृति और परंपरा में बुजुर्गों का साया सिर पर होना सौभाग्य की बात कही जाती है। कहते हैं घर की चौखट पर बुजुर्ग रहें तो परिवार सुखी रहता है। कोल्हापुर की ग्राम पंचायत ने देखभाल न करने वालों की जलापूर्ति रोकने के साथ ही पैतृक संपत्ति से नाम हटाने का प्रस्ताव भी रखा है। महाराष्ट्र सरकार से इस पर कानून बनाने की मांग भी की है। हम जानते हैं कि हमारे रीति-रिवाज, परंपराएं और हमारे पौराणिक ग्रंथ भी माता-पिता, बुजुर्गों का ध्यान रखने की सीख देते हैं। कभी तो लगता है कि यह उन माता-पिता की भी गलती हो सकती है जिन्होंने अपने बच्चों को वो संस्कार नहीं दिए, उन्हें सीख नहीं दी जो आवश्यक थी। लेकिन फिर समझ में आता है कि सीख दी भी होगी तो आज के आधुनिक युग में, हमारे परिवेश में और सामाजिक रहन-सहन में स्वार्थ और एकाकीपन बढ़ा है। पारिवारिकता, सामाजिकता, स्नेहभाव, आदरभाव, बुजुर्गों के प्रति सहानुभूति आदि का बहुत अभाव है। इसके लिए व्यापक सामाजिक पहल की भी आवश्यकता है। कोल्हापुर की ग्राम पंचायत का यह प्रयास भले ही एक सांकेतिक पहल हो, लेकिन यह अच्छा सबक भी हो सकता है।

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