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तड़का: अंधा कानून

कविता श्रीवास्तव
कहते हैं कानून अंधा होता है। वह किसी को देखकर न्याय नहीं करता है। उसके पैâसले निष्पक्ष होते हैं। न्याय सुनाते समय कानून ये नहीं देखता कि सामने अमीर है या गरीब। रसूखदार है या सामान्य आदमी। वह न्यायिक समानता के अधिकार का पालन करता है। अदालतों का काम मन से नहीं, मस्तिष्क से होता है। जज अपने मन के भाव से पैâसला नहीं लेते। नियम-कानून जो कहता है, उसके आधार पर पैâसले होते हैं। यह बात सीबीएसई के विद्यार्थियों के मार्क्स को सुधारने संबंधी एक याचिका पर माननीय जज महोदय ने भी स्पष्ट किया है। एक छात्रा के पिता ने कोर्ट में याचिका दायर करके अपील की थी कि उनकी बच्ची के मार्क्स सुधारने की अदालत अनुमति दे। उनके स्कूल ने सभी विद्यार्थियों के मार्क्स बोर्ड की वेबसाइट पर अपलोड कर दिए थे। सीबीएसई बोर्ड ने कहा कि नियमानुसार, मार्क्स अपलोड होने के बाद उसमें सुधार की अनुमति नहीं है। इसी बात को लेकर अभिभावक ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने नियमों का हवाला दिया और कहा कि एक बार मार्क्स अपलोड हो गए तो उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है इसलिए अदालत ऐसी कोई अनुमति नहीं दे सकता। यदि इस तरह का चलन शुरू हुआ तो गलत परंपरा शुरू हो जाएगी। इस बारे में भावुक अपील को स्वीकार करने से अदालत ने मना किया। अदालत ने कहा कि कोई भी पैâसला मन से नहीं लिया जा सकता है। उसमें मस्तिष्क का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह की टिप्पणी सर्वोच्च अदालत ने बिलकिस बानो प्रकरण में ११ दोषियों की पुनर्गिरफ्तारी का आदेश देते समय भी की। दोषियों की दयाभाव की अपील पर अदालत ने कहा कि कानूनन ऐसे मामलों में दयाभाव का कोई प्रावधान नहीं है। न्याय की अपनी प्रक्रिया है। न्याय सभी के लिए समान है। किसी के लिए सख्त और किसी के लिए सहूलियत हो, इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। इन दोनों मामलों में यह बात स्पष्ट हुई कि जहां हमारे कानून को लगता है कि आरोपी की गलती नहीं है, वह उसे दोषमुक्त करता है। क्योंकि कानूनन सबको न्याय मिलेगा। किसी पर अन्याय नहीं होगा। लेकिन अगर किसी ने अपराध किया है, गलती की है तो कानून अपना काम करेगा। नियम, आचार संहिता, अनुशासन आदि में कोई ढील नहीं दी जा सकती है। साधारणतया, कानून और व्यवस्था के मामले में भी ढील देने का कोई प्रावधान नहीं है। हर काम नियमानुसार होना चाहिए। सच है कि यदि स्कूल-कॉलेज जैसे शैक्षणिक संस्थानों में नियमों और अनुशासन का पालन नहीं होगा तो इससे गलत संदेश जाएगा। गलत परंपराओं की शुरुआत होगी। इसी तरह अदालतें अपराध के दोषियों को क्षमा देकर उन्हें छोड़ने लगें तो फिर अपराध रुकेगा क्या? कोई भी कानून अपराधी को सजा इसलिए देता है, ताकि सुधार हो और अपराध की प्रवृत्ति को रोका जा सके। सामान्य जीवन में भी नियमों का पालन सब पर समान रूप से लागू है।

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