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तड़का : नहीं मानेंगे पटाखेबाज

कविता श्रीवास्तव

मुंबई की आबोहवा इन दिनों बहुत ही खराब है। वायु प्रदूषण बहुत बढ़ गया है। सरकार, प्रदूषण संबंधी एजेंसियां, अफसर, संस्थाएं, महानगरपालिका और हाई कोर्ट सभी चिंतित हैं। कल-कारखानों के धुएं, हर तरफ जारी कंस्ट्रक्शन से उड़ती धूल, होटलों-बेकरियों में कोयले जलाने, मेट्रो और सड़कों के काम से हो रहे प्रदूषण आदि से लेकर फुटपाथ पर लकड़ी जलाकर खाना बनाने तक हर तरफ प्रशासन की नजर है। रोकथाम के उपाय किए जा रहे हैं। नोटिसें थमाई जा रही हैं। दंड की कार्रवाई जारी है, लेकिन फिर भी मुंबई में हर घर धूल से भरा नजर आ रहा है।
हर घर में लोग कफ, खांसी, छींक, सर्दी-जुकाम, इंफेक्शन से जूझ रहे हैं। किसी को सांस की तकलीफ है तो कोई दमा से परेशान है। मुंबई की हालत देखकर दुनिया भी हैरान है, क्योंकि प्रदूषण के मामले में मुंबई दुनिया में चौथे नंबर पर पहुंच गया है। इससे पहले हम दिल्ली की प्रदूषण समस्या पर चिंतित थे, लेकिन आज अपनी पूरी मुंबई में धुआं -धुआं, धूल-धूल और हर तरफ वायु प्रदूषण सबको परेशान किए हुए है। ऐसे में शासन-प्रशासन और कोर्ट ने भी पटाखे के इस्तेमाल पर भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ऐन दिवाली के मौके पर प्रदूषण की इस समस्या को रोकने के लिए पटाखे शाम सात बजे से रात दस बजे तक छोड़ने की सीमा तय की गई है, लेकिन दीपावली में यदि आम जनता चाहे तो पटाखे का इस्तेमाल ही न करे। इससे प्रदूषण रोकने में भारी मदद मिलेगी।
लेकिन हकीकत में हो रहा है इसका उल्टा। मुंबई में पिछले वर्ष की तुलना में इस साल २५ फीसदी ज्यादा पटाखे बिके हैं। जब बिके हैं तो वे पटाखे फूटेंगे भी। और जब यह फूटेंगे तो धड़ाम-धूम का शोर भी होगा। खतरनाक धुआं भी फैलेगा, क्योंकि लोग पटाखे खरीदेंगे तो उसे फोड़ने से भी बाज नहीं आएंगे। वैसे भी दीपावली पर लोगों के खान-पान, सजावट और अच्छे कपड़े पहनने से किसी को समस्या नहीं है। लेकिन कुछ लोग पटाखे इतनी ज्यादा आवाज वाले ले आते हैं कि उससे दूसरों को तकलीफ होती है। कभी-कभी यह भी लगता है कि जिनके पास खूब पैसा है, इन्हें पटाखे फूंक कर लोगों को दिखाते या कभी-कभी चिढ़ाते भी नजर आते हैं।
दिवाली का जश्न जरूर मनाना है, लेकिन यदि अपने परिश्रम के पैसे पटाखे में फूंकने की बजाय वही पैसे इस्तेमाल करके हम गरीबों को भी दिवाली मनाने के लिए उन्हें कुछ मिठाइयां, कपड़े दे आएं तो ज्यादा ही खुशी होगी। मुंबई में वायु प्रदूषण से दम घुटते माहौल में यदि उन गरीबों को भी त्योहार मनाने में हम सहायक बन सकें तो ईश्वर भी प्रसन्न होंगे। लेकिन सवाल बना हुआ है कि क्या पटाखों पर शोरगुल, आतिशबाजी और जगमगाती चकाचौंध का लुत्फ लूटने वाले इस पर ध्यान देंगे?

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