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तड़का : भीख में करोड़ों

कविता श्रीवास्तव

उज्जैन में एक महिला भीख मांगकर ४५ दिनों में ढाई लाख रुपए कमाती है। उसकी सालाना आय २० लाख से अधिक है। यह एक मांगने वाली की आय है। लेकिन महाकाल की नगरी उज्जैन में लगभग छह से सात हजार भिखारी सक्रिय हैं। उनकी सालाना कुल आय करोड़ों में है। यह आंकड़ा वहां भिखारियों पर काम कर रही एक एनजीओ ने निकाला है। अपने तीन बच्चों से भीख मंगवा रही एक महिला को जब पकड़ा गया तो उसके पास से तत्काल १९ हजार रुपए और उसकी बच्ची के पास से छह सौ रुपए नगद मिले। उसका पति और दो बच्चे इस छापेमारी में भाग गए। पता चला कि केवल एक साल में उसने भीख मांगकर दो मंजिला मकान, खेती की जमीन, मोटरसाइकिल और स्मार्टफोन खरीदा है। उसका फिक्स डिपॉजिट भी है। उसका और कोई काम-धंधा नहीं है। जब बिना कोई लागत और बगैर कोई काम किए इस तरह आसानी से भारी रकम मिलती है तो भला कौन काम करना चाहेगा? लेकिन उन बच्चों से भीख मंगवाना गलत है, जो पढ़ने-खेलने की उम्र के हैं, जिनका पूरा भविष्य सामने खुला पड़ा है। वे स्कूल नहीं भेजे जाते हैं, उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता है। उनका भविष्य भीख मांगने को अभिशप्त है। अक्सर हम मांगने वालों के कातर चेहरे, लाचारी दर्शाते उनके हाव-भाव और नन्हें बच्चों को देखकर दयाभाव से भीख दे देते हैं। धार्मिक स्थलों पर हम धर्म का काम मानते हुए मांगने वालों को कुछ थमा ही देते हैं। लेकिन हमारा दान कई बच्चों का भविष्य बिगाड़ रहा है। इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता है। इसी तरह कई लोग आसानी से पैसा मिल जाता है इसलिए भीख मांगने के आदी हो जाते हैं। वे कोई काम-धंधा-रोजगार नहीं करना चाहते हैं। आसानी से मिलने वाले दान या भीख के पैसे लेकर वे मजे करते हैं। इन्हीं सब बातों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भीख मांगने के काम में बच्चों के उपयोग को रोकने के लिए कई संस्थाएं सक्रिय हैं। केवल उज्जैन के भिखारी अगर सालाना करोड़ों रुपए कमाते हैं तो पूरे भारत के सारे भिखारी कितना कमाते होंगे? इसका अंदाजा लगना ही मुश्किल है। कुछ अर्से पहले मुंबई में भिखारी के बड़े गैंग का सरगना करोड़ों की दौलत के साथ पकड़ा गया था। बच्चों को अगवा करके, चुराकर, उन्हें अपाहिज बनाकर भीख मांगने के किस्से भी कई बार उजागर होते हैं। इसलिए दान देने के संबंध में सामाजिक जागरूकता भी आवश्यक है। जरूरतमंदों, लाचारों, लावारिस बच्चों, दिव्यांगों, बूढ़े-बुजुर्गों को जहां जरूरत हो सहायता करनी ही चाहिए। यह तो हमारा सामाजिक दायित्व है। लेकिन हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि पैसे का दान देने की बजाय हम खाने-पीने की व्यवस्था कर दें। जरूरी वस्तुओं का दान दें। उनकी देखभाल करने वाली संस्थाओं की मदद करें। केवल पैसा कमाने के लिए भीख मांगने वालों को पहचानें।

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