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तड़का : बाबू ने खाना खाया क्या…

कविता श्रीवास्तव

इंसान बहुत चटोरा जीव है। लजीज व्यंजन दिखा नहीं कि जीभ लपलपाने लगती है। भूख लगी हो तो जो मिल जाए आदमी झट से चट कर जाता है। फिर वह यह नहीं देखता है कि वह कहां और वैâसे बना है या उसे किसने बनाया है? बस खाने से मतलब है। मुंबई में भोर सुबह से लेकर दिनभर और देर रात तक कुल कितने लोग कितना कुछ खाते-पीते होंगे, इसका कोई अंदाजा ही नहीं है। फाइव स्टार होटलों से लेकर विभिन्न रेस्टोरेंट्स, बार और सड़कों के किनारे बने खोमचों तक खचाखच भीड़ दिन-रात खाते हुए दिखती है। आखिर आदमी को जीना है तो खाना ही होगा, लेकिन खान-पान के ठेलों-खोमचों से लेकर बड़े-बड़े स्टार होटलों तक स्वच्छता का कितना पालन होता है, इस पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया हो। बीते दिनों एक रेस्टोरेंट में डिश में चूहा परोसने की घटना के बाद हल्ला मचा। तब जाकर मुंबई में खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) हरकत में आया। अब जांच, निरीक्षण और छापेमारी हो रही है। नोटिस और दंड की कार्रवाईयों के साथ ही अब तक १८ रेस्टोरेंट्स को बंद करवाया गया है। खानपान का व्यवसाय स्वच्छता मानकों का कितना पालन करता है, यह शायद कोई नहीं देखता। बस खाओ और चल पड़ो। फिर चाहे कोई स्टार होटल हो या चालू किस्म का रेस्तरां। या फिर, कोई वडापाव का ठेला हो या इडली-डोसा, चाइनीज, पिज्जा, बर्गर का स्टाल। कोई व्यंजन किसी रोगी, बीमार या इन्फेक्शन पीड़ित के हाथों बन कर तो नहीं आया है, यह कोई नहीं देखता है? खानपान का व्यवसाय लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करने पाए इसके लिए सख्ती आवश्यक है। मुंबई में हल्ला मचाने के बाद अब तक के एक्शन में लाइसेंसिंग शर्तों के उल्लंघन, एक्सपायरी डेट पूरा होने के बाद भी वस्तुओं का उपयोग, प्रतिबंधित या अत्यधिक सिंथेटिक खाद्य रंगों का प्रयोग, रख-रखाव की कमी, कर्मचारियों की मेडिकल जांच न होना आदि कमियां पाई गई हैं। कई जगहों पर खाद्य सामग्रियों के भंडार आदि में चूहे, कॉकरोच, कीड़े-मकोड़ों का पाया जाना भी चिंताजनक है। कीटनाशकों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ दूषित होने के मामले भी मिलते हैं। शाकाहारी और मांसाहारी पदार्थों के रख-रखाव और उनके पकाने की अलग-अलग व्यवस्थाएं नहीं होना भी पाया गया है। रसोई कर्मचारियों के मेडिकल फिटनेस रिकॉर्ड भी नदारद मिले हैं, जबकि यह सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। खाना पकाने के पानी की स्वच्छता में भी दोष पाए गए हैं। एफडीए के एक्शन के बाद खान-पान के व्यवसाय से जुड़े तमाम रेस्टोरेंट्स, होटलों आदि में खलबली है और वे अब नियमों की अनदेखी से बच रहे हैं। यह सकारात्मक बात है, लेकिन यह सख्ती कब तक लागू रहेगी? इसे निरंतर कायम रखना एफडीए के लिए चुनौती पूर्ण रहेगा। कुल मिलाकर आम जनता के स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं है।

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