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तड़का : ‘रील्स’ का रोग

कविता श्रीवास्तव

अमेरिका के ४२ राज्यों की सरकारों ने फेसबुक, व्हॉट्सऐप और इंस्टाग्राम की कंपनी ‘मेटा’ के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया है। चीन ने कानून बना दिया है कि किस आयु वर्ग का युवा कितने वक्त तक मोबाइल देख सकता है। उसके उल्लंघन पर संबंधित कंपनियों पर जुर्माना ठोका जाता है। क्या हमारे देश में भी ऐसा कोई कानून बनाया जाना चाहिए? क्योंकि हमारा बहुत बड़ा युवा वर्ग ‘रील्स’ बनाने का आदी हो चुका है। जैसे उस पर मिली लाइक्स और कमेंट्स ही जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि या लक्ष्य हो। यह लत मानसिक बीमारी बनती जा रही है। इस पर जागरूकता की जरूरत है कि सोशल मीडिया हमारा कितना सहायक है। समय की मांग है कि हिंदुस्थान में भी कोई कानूनी व्यवस्था बने। क्योंकि ‘रील्स’ का धंधा जानलेवा भी होता जा रहा है। ‘रील्स’ बनाते हुए कई दुर्घटनाएं भी सामने आई हैं और अनहोनियां भी हुई हैं। यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है कि युवा पीढ़ी इसकी जकड़ में है? यह एक सामाजिक और मनोविकारी समस्या है। यह हमारी युवा पीढ़ी पढ़ाई-लिखाई, कारोबार, करियर, सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारियों पर गंभीर नहीं है और उसका महत्व ही भूलती जा रही है। ‘रील्स’ की लत उनके मस्तिष्क पर हमलावर बनकर नकारापन की ओर भी ले जा रही है। हमारी नौजवान पीढ़ी को विभिन्न एप्स पर दुनियाभर के वीडियो और रील्स देखते रहने की लत भी है। यह हम कार्यालयों में, सफर में, सड़कों पर या कहीं भी देख सकते हैं। अमीर-गरीब, पढ़े-लिखे, अनपढ़, मजदूर, कॉलेज के आथुनिक बच्चों से लेकर ठेले पर काम करने वाले तक हर तरफ लोग इसी में व्यस्त दिखाई देंगे। देश में करीब ३८.१ करोड़ युवा १५-२९ साल के वर्ग में हैं। यह पढने- लिखने, खेलने और एक बेहतर करियर बनाने की उम्र है। हमारी आगे की जिम्मेदारियां भी आगे इन्ही के कंधों पर होंगी। लेकिन यह चर्चा का विषय है कि मोबाइल हमारी युवा पीढ़ी का ज्ञानवर्धन करता है या उन्हें खोखला और मानसिक तौर पर अस्थिर बना रहा है। मोबाइल के उपयोग में हिंदुस्थान विश्व में दूसरे स्थान पर है। इस पर हम इतराते रहते हैं। हिंदुस्थान में औसतन ६० लाख ‘रील्स’ या वीडियो हर रोज बनाए जाते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया को ४० करोड़ से अधिक हिंदुस्थानी देखते या इस्तेमाल करते हैं। एक और अध्ययन के मुताबिक, करीब ४५ फीसदी आबादी सोशल मीडिया की शौकीन है। रील्स को देखने या उन पर टिप्पणियां करने में औसतन युवा हर रोज ३-४ घंटे खर्च करता है। ये रील्स कोई शैक्षिक या पेशेवर नहीं होतीं। ज्यादातर रील्स में कोई नाचता-गाता या अभिनय करता दिखाई देता है अथवा कोई चुटकुले सुनाता है या विभिन्न पोशाकों की प्रदर्शनी भी करता है। डेटिंग और रिलेशनशिप की ‘रील्स’ की बहुत बड़ी दुनिया है। ये अलग बात है कि हमारे देश में राजनीतिक बातों के लिए भी सोशल मीडिया का सर्वाधिक उपयोग होता है। शायद दुनिया में सबसे ज्यादा!

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