मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : डॉक्टरों को डोज!

तड़का : डॉक्टरों को डोज!

कविता श्रीवास्तव

दवाई कंपनियों द्वारा डॉक्टरों के लिए सैर-सपाटे, पार्टी, गिफ्ट आदि का आयोजन करना आम बात है। समझ यही है कि बदले में डॉक्टर उनकी महंगी दवाइयां मरीजों को रेफर करते हैं। लेकिन औषधियों की महंगी कीमतें और उन्हें खरीदने का दबाव बनाने के चलन की वजह से डॉक्टरों के खिलाफ नेशनल मेडिकल कमीशन एक्शन मूड में है। इसीलिए फार्मास्युटिकल कंपनियों और डॉक्टरों के बीच सांठ-गांठ तोड़ने के लिए कमीशन ने हाल ही में मजबूत हथौड़ा चलाया। दवा कंपनियों द्वारा प्रायोजित फाइव स्टार की सुविधाएं, मनोरंजन के कार्यक्रमों और उन कंपनियों के खर्च पर सैर-सपाटे आदि से डॉक्टरों को दूर रहने की सख्ती लगाई गई। इस बारे में नियमावली बना दी गई। डॉक्टरों को उन कंपनियों की ओर से मानधन, गिफ्ट्स और फीस स्वीकारने पर रोक का आदेश जारी किया गया। इन नियमों का उल्लंघन पर उनके मेडिकल प्रैक्टिस के लाइसेंस भी रद्द करने के प्रावधान किए गए। इस पर दवा कंपनियों और डॉक्टरों का नाराज होना स्वाभाविक है। डॉक्टरों की संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और दवा कंपनियों की संस्था इंडियन फार्मास्यूटिकल्स अलायंस देश के स्वास्थ्य मंत्री के पास अपनी फरियाद ले गए। उनके हस्तक्षेप पर नए नियम अभी लागू होने से रोके गए हैं।
हम जानते हैं कि बीमार होने पर डॉक्टर ही सहारा होते हैं। हम उन्हें भगवान का रूप मानते हैं, लेकिन इसकी आड़ में डॉक्टर मनमानी फीस वसूलने के साथ ही अपने पसंद की दवाइयां खरीदने को भी मजबूर करते हैं। उनकी लिखी दवाइयों की कीमतें अक्सर बहुत ज्यादा होती हैं, जबकि उसी फॉर्मूले की दूसरी दवाई बहुत ही कम दरों पर बाजारों में उपलब्ध होती हैंै। नेशनल मेडिकल कमीशन ने नागरिकों की इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए डॉक्टरों के लिए विशेष तौर पर नियमावली तय की कि वे मरीजों की पर्ची पर जेनरिक दवाइयां लिखें। उनके दाम बहुत कम होते हैं, जबकि ब्रांडेड दवाइयों के दाम चुकाने से तो जेब ही हल्की हो जाती है। यही वजह है कि हम सभी केवल डॉक्टर ही नहीं अस्पताल जाने के नाम पर ही घबराने लगते हैं। इसमें सबसे ज्यादा चिंता अस्पताल के बिल और दवाइयों की कीमत को लेकर होती है। निजी अस्पताल विभिन्न जांच, कंसल्टिंग फीस, बेड चार्ज, नर्सिंग चार्ज, इंजेक्शन एडमिनिस्ट्रेशन चार्ज, विजिटिंग फीस और न जाने क्या-क्या जोड़कर इतना लंबा बिल बनाते हैं कि उन्हें देख कर ही आदमी गश खा जाता है, जबकि यही इलाज सरकारी अस्पतालों में और ढेर सारे चैरिटी केंद्रों पर मुफ्त या बेहद सस्ते में हो जाता है। इस विसंगति को दूर करने के लिए भी नेशनल मेडिकल कमीशन और हमारे स्वास्थ्य मंत्रालय को सख्त नियम बनाने चाहिए। एक ही फॉर्मूले की भिन्न-भिन्न दवाइयों का निश्चित दर सरकार तय करे। इसी तरह हर इलाज की एक निश्चित दर पूरे भारत में तय हो, ताकि चिकित्सा जगत की लूटपाट पर लगाम लगाई जा सके। देश में केवल योजनाएं न बनें। ईमानदारी से आयकर भरने वाले हर नागरिक का इलाज मुफ्त में हो, ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए। इसी तरह मेडिकल पढ़ाई की सीटें लाखों में बिकने की प्रथा भी बंद होनी चाहिए, नहीं तो मेडिकल पढ़ाई का महंगा खर्चा बाद में डॉक्टर इसी तरह वसूलते रहेंगे।

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