मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : मछली की दुर्गंध

तड़का : मछली की दुर्गंध

कविता श्रीवास्तव

अर्जुन द्वापर युग के सबसे अच्छे धनुर्धर और द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। उन्होंने मछली के प्रतिबिंब को तैलपात्र में देखते हुये एक ही बाण से उसकी आंख को भेद दिया था। द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी। लेकिन आज के युग में किसी धनुर्धर को नहीं, बल्कि अब महिलाओं को मछली का सहारा लेने की सलाह मिली है। यह सलाह भी किसी और ने नहीं बल्कि महाराष्ट्र के एक मंत्रीजी ने दी है। मंत्रीजी बेचारे गए तो थे धुलिया में मछुआरों को जाल बांटने, लेकिन भावावेश में उन्होंने महिलाओं को अपने नेक विचार भी बांट दिए। उन्होंने कहा कि मछली खाने से आंखें सुंदर बनती हैं। महिलाएं ‘चिकनी’ भी दिखने लगती हैं। मछली खाने वाली महिलाओं को जो देखेगा, उनको पटाना चाहेगा। दरअसल, उनका इशारा मछली खाने से मिलने वाले लाभ की ओर था। लेकिन वे भावावेश में कुछ ऐसा कह गए, जिसका महिलाओं ने विरोध कर दिया। बाद में उन्हें सफाई देनी पड़ी कि उनके कहने का मतलब ऐसा नहीं था जैसा कि समझा गया। हालांकि, मंत्रीजी की सफाई से मामला एकदम शांत नहीं हुआ है। उन्हें महिला आयोग ने नोटिस थमा दी है। विभिन्न दलों के नेताओं ने उन पर कटाक्ष किया है। मंत्रीजी के दावों के बाद नियमित मछली खाने वाले कुछ लोग तो धीरे से आईने में अपनी आंखें भी देख आए। उनमें सुंदरता ढूंढते रहे। इस बीच कुछ लोग तो दबे पांव थैली छिपा कर मछली खरीदने भी पहुंच गए। लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा कि मछली स्वत: तभी तक सुंदर दिखती है जब तक वह पानी के भीतर होती है। पानी के बाहर आते ही वह तड़फड़ा उठती है। खत्म हो जाती है और दुर्गंध ही पैâलाती है। इसीलिए कोई अच्छा विचार है भी तो वह एक सीमा में, कुछ मर्यादाओं में व्यक्त होना चाहिए। मर्यादा से बाहर होने पर उसकी वही हालत होती है, जैसी पानी से बाहर निकलने पर मछली की हो जाती है। विचारों का महत्व ही नहीं रहता और दुर्गंध की तरह गलत संदेश पैâलने लगता है। फिर मंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति को तो ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। हमारी महिलाएं हमारे समाज के लिए सम्मानजनक हैं। हमारी किसी टिप्पणी से कोई असहजता या अपमान सा महसूस करे, यह उचित नहीं। फिर चाहे वे महिलाएं हों या चाहे कोई और, कोई विचार विवादास्पद न बने यह हमेशा ही ध्यान रखना चाहिए।
इसीलिए कबीर ने लिखा है…
ऐसी बानी बोलिए,
मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करे,
आपहु शीतल होए।।

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