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तड़का: जजों की जुबान फिसली

कविता श्रीवास्तव

कलकत्ता हाई कोर्ट के दो पूर्व जजों के बयानों ने बीते हफ्ते खूब बवाल मचाया। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज अभिजीत गंगोपाध्याय राजनीति में उतरे हैं। वे वर्तमान आम चुनाव में पश्चिम बंगाल की तमलुक लोकसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार हैं। उन्होंने हल्दिया में अपने चुनावी भाषण में टीएमसी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी कर दी। निर्वाचन आयोग ने इसे गंभीरता से लिया और उनके चुनाव प्रचार पर २४ घंटे का बैन लगाया। चुनाव आयोग ने अभिजीत की टिप्पणियों की निंदा की और उसे निम्न स्तर का व्यक्तिगत हमला और महिलाओं का अपमान बताया है। जज रहे व्यक्ति से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं होती है। चुनाव आयोग ने कहा कि अभिजीत गंगोपाध्याय का बयान किसी भी महिला के संबंध में उपयोग किए जाने पर पूरी तरह से निंदनीय है। ममता बनर्जी न केवल वरिष्ठ राजनेता हैं, बल्कि वे संवैधानिक पद पर भी विराजमान हैं और उन्हीं को निशाना बनाया गया है। आयोग ने अभिजीत को नोटिस भेजा था। जवाब के बाद आयोग ने कहा कि उन्होंने निम्न स्तर का व्यक्तिगत हमला किया है जो आदर्श आचार संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन है। आयोग ने गंगोपाध्याय को सार्वजनिक बयानों में सावधानी बरतने की सख्त चेतावनी दी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को कहा कि वे अपनी पार्टी की ओर से सभी उम्मीदवारों और प्रचारकों को एडवाइजरी जारी करें, ताकि यह सुनिश्चित हो कि चुनाव के दौरान ऐसी गलती फिर न हो। आयोग की यह कार्रवाई महिला सम्मान की दृष्टि से प्रशंसनीय है। हमारे देश में नहीं दुनियाभर में महिलाओं का सर्वोच्च सम्मान है। हमारे संविधान ने भी महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को सुनिश्चित करने और उन्हें सशक्त बनाने के विचारों और आदर्शों को लगातार आगे बढ़ाया है। राजनेताओं से उनके बारे में मर्यादित भाषा की उम्मीद की जाती है। गंगोपाध्याय न्यायिक सेवा की पृष्ठभूमि से आते हैं। उनसे यह गलती होना राजनीतिक बयानों की अति ही है। एक अन्य मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश चितरंजन दास का बयान भी चर्चा में है। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति पर कलकत्ता हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ के समक्ष भाषण दिया। भाषण में वे अपने भावों पर काबू नहीं रख पाए और स्वयं के आरएसएस का सदस्य होने की बात उजागर कर दी। उन्होंने कहा कि वे पहले भी इससे जुड़े हुए थे। आगे भी कोई जिम्मेदारी मिली तो निभाएंगे। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि जज रहते हुए उन्होंने कोई पूर्वाग्रह नहीं रखा, लेकिन उनका भाषण कोर्ट परिसर में पूर्ण पीठ के समक्ष जारी था। इस बात का उन्हें खयाल रखना चाहिए था। न्यायिक पद पर आसीन व्यक्ति व न्यायिक परिसर निष्पक्ष और तटस्थ ही रहने चाहिए। उस स्थान पर ऐसी बातें शोभा नहीं देती हैं। हाई कोर्ट के जज रहे अभिजीत गंगोपाध्याय और चितरंजन दास के इन बयानों से न्यायिक महकमा भी चकित है।

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