मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का: न कोई बाघ न कोई दाग

तड़का: न कोई बाघ न कोई दाग

कविता श्रीवास्तव
कई बार देखा गया है कि कुछ नहीं पढ़ने वाला भी अच्छे नंबरों से पास हो जाता है। अपराधी किस्म के लोग भी नेता चुन लिए जाते हैं। कई बार गृहस्थी के पचड़े में फंसा व्यक्ति भी साधु बना दिया जाता है। लेकिन यह तो पहली बार सुना है कि देश के जिन बाघ अभयारण्यों में एक भी बाघ नहीं है उसे भी ‘वेरीगुड’ का रिमार्क दिया गया है। हमारे राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एक नहीं ऐसे पांच टाइगर रिजर्व को वेरीगुड, गुड और फेयर यानी बहुत अच्छा, अच्छा और माकूल बताया है। है न अजीब बात। बाघ संरक्षण के लिए बने अभयारण्य से बाघ नदारद हैं। फिर भी वे बहुत अच्छे हैं। साथ ही सात अभयारण्यों में केवल एक-एक बाघ ही है। फिर भी वे सभी बहुत अच्छे बताए गए हैं। कमाल की बात है न। अगर ये अभयारण्य बाघों के लिए बहुत अच्छे हैं, तो यहां बाघ क्यों नहीं हैं? उन्हें भी यहां होना चाहिए न! क्या इन अभयारण्यों में पर्यटक केवल वहां की स्वच्छता साफ-सफाई और बाघों को रखने की माकूल व्यवस्था देखने जाएंगे? नहीं न! पर्यटकों को तो साक्षात बाघ देखने में मजा आता है। बाघ वैसे भी जंगली प्राणी हैं। वह करीब से वैâसा दिखता है? जंगलों में किस तरह रहता है? वैâसी हरकतें करता है? यही देखने का लुत्फ पर्यटक उठाना चाहते हैं। इसलिए बाघ दिखना भी तो चाहिए। अन्यथा ये तो वही बात हुई कि कागजों में कोई पुल बन गया। जब मुआयना हुआ तो बताया गया कि बह गया। बुजुर्ग बताते हैं कि उनके जमाने में ऐसे न जाने कितने पुल कागजों में बना दिए जाते थे, जो उन्होंने कभी देखे तक नहीं। ठीक उसी तरह लगता है हमारे अभयारण्य बहुत अच्छे हैं। लेकिन वहां बाघ किसने देखा, पता नहीं। कहावत भी है न, जंगल में मोर नाचा किसने देखा? अब यही पूछना होगा कि इन बाघ स्थलों पर बाघ दहाड़ा, किसने सुना!!!
फिर भी यह गर्व की बात है कि दुनिया के कुल बाघों में ७० प्रतिशत हिंदुस्थान में हैं। हमारे यहां ५३ बाघ अभयारण्य हैं। इनमें तीन हजार से अधिक बाघ हैं। उत्तराखंड के जिम कार्बेट में लगभग २६० बाघ हैं। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में खूब बाघ हैं। इसके आलावा उत्तराखंड, कर्नाटक और महाराष्ट्र में बाघों की संख्या अधिक है। महाराष्ट्र में ९७ बाघों वाला ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व पर्यटकों की लोकप्रिय जगह है। हमारे अधिकांश बाघ रॉयल बंगाल प्रजाति के हैं। सफेद बाघ भी हमारे यहां रहे हैं। पर अब दिखते नहीं। प्रशासन व नियमों की सख्ती के बाद बाघों का शिकार करना भी थमा है।

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