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तड़का : मातृत्व का सम्मान

कविता श्रीवास्तव

मातृत्व तो प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार है। माता बनना सौभाग्य की बात है। संसार की यही प्रकृति है। जननी की कोख में जीवन का आना परमसुख की अनुभूति है। संसार का क्रम इसी मातृत्व शक्ति के बल पर निरंतर आगे बढ़ रहा है, लेकिन क्या मातृत्व बनने का शुभ अवसर किसी महिला को नौकरी से भी वंचित कर सकता है? ऐसा हुआ। हरिद्वार के एक अस्पताल में एक महिला को नर्स की नौकरी पर केवल इसलिए नहीं रखा गया, क्योंकि उसके पेट में १३ सप्ताह का गर्भ था। इसका आधार सरकार का एक गजट है, जो १२ सप्ताह से अधिक गर्भावस्था होने पर महिलाओं को अस्थाई तौर पर अयोग्य बताता है। इसी को आधार बनाकर नैनीताल के एक अस्पताल ने एक महिला को नर्स की नौकरी नहीं दी। महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने गर्भावस्था को अयोग्य बताए जाने पर भारी नाराजगी व्यक्त की। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि मातृत्व तो प्रकृति का सबसे उत्तम उपहार है। हाई कोर्ट ने सभी आवश्यक योग्यताओं पर खरी उतरनेवाली उस महिला को नौकरी पर रखने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट का कहना था कि किसी महिला को नौकरी मिलने के बाद जब वह गर्भवती होती है तो उसे नौकरी से नहीं निकाला जाता, बल्कि उसे मातृत्व अवकाश दिया जाता है। इसी तरह किसी महिला में सारी योग्यताएं हैं। वह सभी शर्तों को पूरा करती है और योग्य साबित होती है। तब केवल गर्भावस्था को उसकी अयोग्यता ठहराना उचित नहीं है। उसे सेवा में शामिल किया जाना चाहिए। महिलाओं के पक्ष में अदालत द्वारा इस तरह के फैसले क्रांतिकारी कदम ही कहे जाएंगे। हमारी अदालतों ने महिलाओं के पक्ष में कई क्रांतिकारी फैसले दिए हैं। केरल में कभी महिलाओं की संख्या अधिक हुआ करती थी। इसलिए वहां लड़के पैदा करने को प्राथमिकता दी जाने लगी। एक महिला ने खुद पर लड़का पैदा करने का ससुराल पक्ष द्वारा निरंतर दबाव डाले जाने पर अदालत की शरण ली। अदालत ने मामले की गंभीरता समझने के बाद में उसके ससुराल वालों से लिखित आश्वासन लिया कि वे उसे गर्भधारण करने एवं बच्चा पैदा करने में मदद करेंगे। उसे परेशान नहीं करेंगे। महिलाओं के पक्ष में सबरीमाला मामले में भी अदालत ने क्रांतिकारी फैसला देकर उन्हें मंदिर में जाने की अनुमति प्रदान की थी। कई कार्यालयों में महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम करने से भी अदालतों ने बचाया है। महिलाओं से जबरन नाइट ड्यूटी नहीं कराई जा सकती। इस तरह हम देखते हैं कि महिलाओं के पक्ष में अदालतें बारंबार ढाल बनकर खड़ी होती हैं। उनके अधिकारों की रक्षा करती हैं, क्योंकि हमारे संविधान, हमारे नियम-कानून में महिलाओं के अधिकारों के लिए ढेर सारे प्रावधान हैं। उनकी शारीरिक संरचना और उनकी घरेलू जिम्मेदारियां पुरुषों से भिन्न हैं। समानता की तमाम बातों का सामाजिक पहलू महिलाओं के उत्थान के लिए हैं। महिलाओं और पुरुषों में नैसर्गिक भिन्नता को सकारात्मक दृष्टि से समझना चाहिए। भारत सदियों से पुरुष प्रधान परिवारों और पुरुष प्रधान समाज की परंपराओं को अपनाता रहा है। लेकिन इससे महिलाओं का शोषण और उनके अधिकारों का दमन होता रहा है, लेकिन आधुनिक युग में कानूनी शक्ति मिलने से महिलाएं अपने अधिकारों के लिए जागरूक हुई हैं। उत्तराखंड के उच्च न्यायालय ने गर्भवती महिला को नर्स की नौकरी दिलाने के निर्देश के साथ ही मातृत्व के गौरव को भी सम्मान दिलाया है।

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