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तड़का: सहाराश्री का जाना

 कविता श्रीवास्तव

एक समय देश के सशक्त बिजनेसमैन व अत्यंत ही प्रभावशाली शख्सियत रहे सहारा समूह के सर्वेसर्वा सुब्रत राय उर्फ सहाराश्री बीते हफ्ते इस दुनिया से अलविदा हो गए। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट आई जिसमें कहा गया कि ये वही सहाराश्री थे, जिन्होंने अपने दोनों बेटों के विवाह पर करोड़ों रुपए खर्च कर लखनऊ को आलीशान राजा की जगमगाती नगरी में तब्दील कर दिया था। लेकिन वही बेटे उन्हें मुखाग्नि देने भी नहीं पहुंच पाए। यह सही है कि बेटों के विवाह में सहाराश्री के निमंत्रण पर राजनीति, फिल्म, व्यवसाय से लेकर सभी प्रमुख क्षेत्रों से जुड़ी तमाम लोकप्रिय और नामी हस्तियां लखनऊ में उनकी मेहमान बनीं थीं। लखनऊ हवाई अड्डे पर चार्टर्ड प्लेनों और हेलीकॉप्टरों का कारवां लग गया था। सहारा समूह के कई ऐसे आयोजनों में पूरा बॉलीवुड नाचता-गाता दिखता था। सहारा समूह ने एक दशक तक क्रिकेट को करोड़ों रुपए देकर हिंदुस्थानी टीम की स्पॉन्सरशिप ली थी। वर्ल्ड कप जीतने वाले क्रिकेट खिलाड़ियों को उन्होंने लोणावाला के पास एंंबीवैली में मुफ्त बंगले दिए। देश की प्रमुख हस्तियां अरसे तक उनकी मेहमान बनीं रहीं। पर उनकी मौत हुई तो उनके यार-मित्र, शुभचिंतक समझे जाने वाली अनेक बड़ी हस्तियां उन्हें श्रद्धांजलि देने तक नहीं पहुंचीं। फिर भी, अखिलेश यादव, राज बब्बर, क्रिकेटर सुरेश रैना, गायक सोनू निगम सहित सहारा समूह के लगभग पांच हजार लोगों का कारवां उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुआ। सहारा समूह एक समय पूरे देश में रेलवे के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला समूह रहा। आज भी उससे लाखों लोगों का रोजगार चल रहा है। फाइनेंस, इंफ्रास्ट्रक्चर, होटल, हॉस्पिटैलिटी, कंस्ट्रक्शन, एवियशन, मीडिया, एज्युकेशन और तमाम उद्योगों में उनकी तूती बोलती थी। लेकिन आर्थिक विवादों के चलते उन्हें अपने अंतिम वर्ष जेल में भी बिताने पड़े। इसी से बचने के लिए उनके बेटों और पत्नी ने विदेशी नागरिकता ले ली है और वहीं रहते हैं। उनकी मौत पर उनकी पत्नी स्वप्ना राय ने पोतों के साथ पहुंच कर अंतिम क्रिया पूरी कराई। बेटे केवल गिरफ्तारी के भय से नहीं आए। लेकिन फिल्म, ग्लैमर, राजनीति, उद्योग से जुड़े उनके अभिन्न मित्र रहे अनेक लोग नहीं पहुंचे। यह इस बात का इशारा है कि जब तक आप सफलता के घोड़े पर सवार हैं, कुछ लोग तभी तक आपके साथ रहेंगे। आपके कमजोर होते ही उनका साथ छूट जाएगा। लोग बिखरते जाएंगे और एक समय आप अपने आप को अकेला भी महसूस करेंगे। शायद व्यवहारिक जीवन की यही सच्चाई है। लेकिन पांच हजार लोगों का कारवां यह भी बता गया कि जहां आत्मीय रिश्ते हैं, वहां मानवीय संवेदनाएं भी हैं, जो ग्लैमर और झूठमूठ के दिखावट भरे जीवन से बहुत ऊपर हैं। सहाराश्री के परिजन, उनके कुछ करीबी और उनकी संस्थानों से जिन परिवारों का रोजगार है वे ही रिश्ते अंत में उनका सहारा बने रहे। बाकी ने तो उन्हें बेसहारा ही छोड़ दिया। शायद, यही बदलते वक्त के साथ दुनिया के बदलते रुख का चलन है।

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