मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : सावन ने वाट लगाई!

तड़का : सावन ने वाट लगाई!

कविता श्रीवास्तव

विविधता में एकता हमारा सबसे बड़ा सौंदर्य और हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। सावन का महीना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। क्योंकि मांस-मदिरा जैसी चीजों का सेवन करने वाले ढेर सारे लोग कम से कम इस महीने एकमत दिखते हैं और परहेज रखते हैं। हालांकि, उनके लिए इस बार दोहरा झटका है क्योंकि सावन का महीना और पुरुषोत्तम मास (या अधिक मास) एक साथ पड़े हैं। इसलिए मांस-मदिरा त्यागने का उनका समय लंबा खिंच गया है। ऊपर से उपवास हो तो चटाकेदार भोजन से भी कभी-कभी दूर रहना पड़ता है। पूरे दो महीने परहेज रखना पड़ रहा है और बड़ी खुशी की बात है कि विभिन्न रीति-रिवाजों, परंपराओं और मान्यताओं की भिन्नता के बावजूद अधिकांश लोग इन दिनों पूजा-पाठ-परहेज के पूरे मूड में हैं। यह हमारी संस्कृति और परंपराओं की सुदृढ़ता और उसके व्यापक प्रभाव का श्रेष्ठ प्रमाण है। सावन के महीने और पुरुषोत्तम माह दोनों में ऐसी वस्तुओं का सेवन नहीं करने के नियमों का लोग सख्ती से पालन कर रहे हैं। इसका प्रमाण दिया उस मुर्गी विक्रेता ने, जिसने हमसे पूछा कि भाई यह सावन का महीना कब तक चलेगा? मैंने उसी से पूछा, तुम्हें क्या तकलीफ है? तो उसने कहा भाई धंधे की वाट लगी पड़ी है। कोई खरीद नहीं रहा है। उसकी व्यथा से समझ आया कि धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले भी कम नहीं हैं। भले वे अंशत: ही करें, लेकिन ईश्वर के प्रति आस्था रखने वालों की संख्या बहुत बड़ी है। वैसे भी इन दिनों मंदिरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी पड़ी है। श्रद्धालुओं की भीड़ इतनी अधिक है कि फिलहाल ज्योतिर्लिंगों के ही नहीं बल्कि सोमवार के दिन तो शिवजी के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं। पूजा-पाठ करनेवाले ब्राह्मण बहुत ही व्यस्त दिखते हैं। फूल-फल आदि के दाम भी बहुत बढ़े हुए हैं। आगामी दिनों में उत्सवों की खूब झड़ी लगी रहेगी। क्योंकि अभी से ही रक्षाबंधन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गणेशोत्सव के लिए भी लोगों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। तीज-त्योहारों के आनंद में सराबोर होकर परिवार और सामाजिकता के साथ उत्सव मनाने की मनुष्य की प्रकृति है। स्वभाव और आदतों का उसका यह बदलाव यदि कहीं वाट लगा रहा है तो कहीं लॉटरी भी खोल रहा है। क्योंकि तीज-त्योहारों से संबंधित वस्तुओं की बेतहाशा खरीदारी भी खुलकर हो रही है। ऐसी वस्तुओं से बाजार पटे पड़े हैं। प्रसंग बदलते ही मनुष्य अपनी आदतें भी बदल देता है। जीवन की निरंतरता में यह तो चलता रहता है। लेकिन त्योहारों के पावन प्रसंग हमें सिखाते भी हैं और अभ्यास भी कराते हैं कि सादगीभरा जीवन भी कितना सुखमय और आनंदमय होता है।

अन्य समाचार