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तड़का : दम मारना बंद करो

कविता श्रीवास्तव

दम क्या होता है सबको पता है। श्रमिक जब पूरी ताकत से काम करते हैं तो आत्मविश्वास भरा स्वर उठता है, ‘दम लगा के हइशाऽऽऽ…।’ पर, नशाखोर जब इकट्ठा होते हैं तो मदहोशी में झूमकर कहते हैं, ‘दम मारों दम…।’ श्रमिकों का दम देश, समाज और परिवार को उन्नति की राह पर ले जाता है और मजबूत बनाता है। लेकिन ये झूमने वाला दम देश और समाज के लिए घातक है और व्यक्ति को खोखला बनाता है। इसीलिए अनेक नशीले पदार्थ प्रतिबंधित हैं। लेकिन लोग नियम-कानून को ताक पर रखकर नशाखोरी का धंधा करते हैं। हाल ही में तेलंगाना में गांजा चॉकलेट की बड़ी खेप पकड़ी गई है। प्रोफेशनल तरीके से रैपर्स में पैक गांजे की ऐसी ही चॉकलेट रूपी सप्लाई कुछ अर्सा पहले चेन्नई, हैदराबाद और बंगलुरु में भी पकड़ी गई थी। यानी नशे के सौदागरों का नेटवर्क सक्रिय है और ढेर सारे लोग खरीददार हैं। पुलिस से आंखमिचौली करता इसका व्यापार देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक ताने-बाने को बड़ी क्षति पहुंचा रहा है। नशे की वजह शौक के अलावा कुंठा, अवसाद, पारिवारिक कलह, असफलता आदि गिनाई जाती है। अनुमान के मुताबिक देश की लगभग २.५० करोड़ आबादी अफीम, डोडा, हेरोइन, स्मैक और ब्राउन शुगर का नशा करती है। जबकि शराब, गांजा, चरस के नशेड़ी बहुत बड़ी संख्या में हैं। नशाखोरी स्वास्थ्य के साथ जेब पर भी असर करती है। सड़कों पर रहनेवाले कई बच्चे यौन शोषण और शारीरिक-मानसिक शोषण का शिकार बनते हैं। फुर्सत पाते ही वे सस्ते नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। हेरोइन, अफीम, शराब, वैâनाबिस और प्रोपॉक्सीफीन जैसे नशीले पदार्थों का बच्चे सेवन करते हैं। नशे की वजह से अपराध भी होते हैं। नशा परिवार के साथ समाज को भी प्रभावित करता है इसीलिए कहा जाता है कि नशा नाश का द्वार है। नशे की लत व्यक्ति को परिवार से दूर करती है और वह अक्सर आर्थिक तंगी झेलता है। बुरे वक्त में कोई साथ भी नहीं देता है। अनुमानत: हमारे देश में ३८ करोड़ से ज्यादा लोग नशा करते हैं। इनमें नाबालिग बड़ी संख्या में शामिल हैं। नशीले पदार्थ इथियोपिया, नाइजीरिया, युगांडा आदि से दुबई, शारजाह होकर भारत पहुंचते हैं। नेपाल, पाकिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश के रास्ते भी नशीले पदार्थ भारत आते हैं। हालांकि, जांच व खुफिया एजेंसियों आदि ने इस पर काफी अंकुश लगाया है। इनकी खरीददारी और सेवन रोकने का अभियान भी चलाया जाता है। फिर भी सख्त रोकथाम नहीं हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार १० से १७ साल की आयु के बच्चों में अफीम, सेडेटिव्ज और इनहेलेंट्रस का चलन बढ़ रहा है। सबसे अधिक प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, नई दिल्ली, मध्य प्रदेश, आंध्रप्रदेश, असम, छत्तीसगढ, गुजरात, हरियाणा, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल हैं। लेकिन दक्षिणी राज्यों में गांजे की खपत भी भारी नशाखोरी की लत उजागर करती है। इसे पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर रोकना होगा।

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