मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : चिकित्सा की लूट रोको

तड़का : चिकित्सा की लूट रोको

कविता श्रीवास्तव

इलाज के नाम पर भारी वसूली को सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान में लिया है। एक याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह अस्पताल के शुल्कों की मानक दरें तय करे। नहीं तो केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजना के मुताबिक दरें सुनिश्चित कर दी जाएंगी। शहरों-कस्बों के अस्पतालों के लिए केंद्र सरकार ने क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट (सेंट्रल गवर्नमेंट) रूल्स बनाया है। इसके तहत राज्य सरकारों के परामर्श से इलाज और इलाज की तमाम प्रक्रियाओं की दरें निश्चित करना अनिवार्य है। केंद्र सरकार की ओर से इस संबंध में राज्य सरकारों को सूचना दी गई है। लेकिन राज्य सरकारें इस पर ध्यान नहीं दे रही हैं। केंद्र ने क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट (सेंट्रल गवर्नमेंट) रूल्स वर्ष २०१२ में लागू किया था। इसके नियम ९ के अनुसार चिकित्सा शुल्क सरकारी मानक दरों के अनुसार होना चाहिए। फीस, निदान आदि की दरें स्थानीय भाषाओं और अंग्रेजी में स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध होनी चाहिए। लेकिन निजी अस्पतालों में उनकी दरें इतनी ज्यादा होती हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं पाता है। इसीलिए बीमारी, डॉक्टर, चिकित्सा और अस्पताल का नाम सुनते ही सबसे पहले यह सवाल सबको डराता है कि कितना खर्च होगा? खर्च चाहे जो लगे हर आदमी यही सोचता है कि पैसा किसी की जान से बढ़कर नहीं है। बस हमारी इसी भावुक सोच का फायदा उठाकर चिकित्सा का भारी भरकम बिल हमारे सामने रख दिया जाता है। विभिन्न बीमारियों और उनके निदान के लिए हर जगह अलग-अलग दाम वसूले जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की फीस और विभिन्न सेवाओं के लिए अस्पतालों की अलग-अलग व महंगे चार्ज देखकर हर किसी का माथा ठनक जाता है। मरीज को स्वस्थ करने पर डॉक्टर भगवान नजर आता है लेकिन अस्पतालों की फीस देखकर हमें लुट जाने का अहसास भी होने लगता है। कोविड के दौरान जब मनमानी वसूली हुई तो सरकार ने तुरंत ही इलाज के लिए मानक दरों को अधिसूचित किया था। सरकार विभिन्न उपचारों और प्रक्रियाओं की फीस को एकतरफा अधिसूचित करने के लिए कानूनों का उपयोग कर सकता है। उपचार सभी के लिए प्राथमिक आवश्यकता है। यह सरकार का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को यदि नि:शुल्क नहीं तो सस्ती चिकित्सा देखभाल प्रदान करे। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दरें नियमित हों और नागरिकों को लूटा न जाए। क्योंकि चिकित्सकों की फीस और अस्पतालों के महंगे चार्ज देखकर हर किसी का माथा ठनक जाता है। व्यक्ति के ठीक होने पर डॉक्टर में भगवान नजर आता है। लेकिन अस्पतालों के चार्ज देखकर हमें लुट जाने का एहसास भी होने लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में अहम टिप्पणियां की हैं। सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

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