मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : सनी की कन्नी

तड़का : सनी की कन्नी

कविता श्रीवास्तव

सनी देओल की ताजा फिल्म खूब चल गई है। वे हर जगह घूम-घूम कर फिल्म का जोरदार प्रचार भी कर रहे हैं। टीवी शो में दिख रहे हैं। खूब इंटरव्यू दे रहे हैं। वैâमरा टीम के साथ सेना के जवानों के बीच पहुंच रहे हैं। सड़कों पर रैलियां निकाल रहे हैं। यह सब वे अपनी ताजा फिल्म को सुपरडुपर हिट बनाने के लिए कर रहे हैं। क्योंकि फिल्में पैसा देती हैं। इतना पैसा कि साधारण आदमी की पूरी जिंदगी लग जाए फिर भी वो उतना नहीं कमा सकता। सुना है कि उनकी ताजा फिल्म ने अब तक साढ़े तीन सौ करोड़ का व्यापार कर लिया है। इसीलिए फिल्मी कलाकारों को सितारा कहा जाता है और फिल्मी दुनिया जगमगाती दुनिया कही जाती है। यह अभिनय कला की दुनिया है। उसकी अपनी लोकप्रियता है। ग्लैमर और चकाचौंध है, जो सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। लेकिन सनी देओल फिल्मी कलाकार होने के साथ-साथ पंजाब के गुरदासपुर से लोकसभा के निर्वाचित संसद सदस्य भी हैं। पर अफसोसजनक है कि जनता की बात उठाने के लिए उनकी आवाज हम केवल फिल्मी पर्दे पर ही सुनते हैं। लोकसभा के पटल पर तो उनकी जुबान ही नहीं खुलती है। वे लोकसभा जाने से भी कन्नी काट लेते हैं। हाल ही में संपन्न संसद के मानसून सत्र में सनी देओल एक भी दिन उपस्थित नहीं हुए, जबकि इस सत्र में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और दिल्ली सेवा बिल जैसे गंभीर विषय थे। उनकी पार्टी ने इसके लिए व्हिप भी जारी किया था। सनी देओल २०१९ में पंजाब के गुरुदासपुर से निर्वाचित होकर लोकसभा पहुंचे हैं। जनता के प्रतिनिधि के तौर पर जनता के लिए काम करना सांसदों-विधायकों का दायित्व होता है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद कुछ जनप्रतिनिधियों को इसकी फिक्र ही नहीं होती। एक रिपोर्ट के अनुसार सनी देओल ने लोकसभा के १२ सत्रों में केवल एक प्रश्न पूछा है। उन्होंने जनहित के कार्यों के लिए मिलने वाली सांसद निधि का भी बहुत ही कम उपयोग किया है। संसद में उनकी उपस्थिति भी बहुत ही कम और कई बार लगभग नगण्य रही है। किसी भी निर्वाचित लोकप्रतिनिधि का यह कार्य तो निराशाजनक ही कहा जाएगा। जनप्रतिनिधि के रूप में यह तो अकर्मण्यता ही सिद्ध करता है। किन्हीं अपरिहार्य परिस्थितियों के अलावा यदि कोई भी जनप्रतिनिधि अपनी ड्यूटी न निभाए तो उसे भी अयोग्य ही समझना चाहिए। लेकिन हम देखते हैं कि अक्सर विपक्षी सांसद जब जनता की आवाज पुरजोर तरीके से उठाते हैं तो उन्हें निलंबित किया जाता है। उनकी सदस्यता बर्खास्त की जाती है। उन्हें चुप रहने को कहा जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को अपनी आवाज बनाकर सदन में भेजती है। वो किसी भी पार्टी के हों, उनका दायित्व बनता है कि वे वह ड्यूटी निभाएं जिसका दायित्व उन्होंने लिया है। लेकिन सनी देओल अकेले नहीं हैं। देश में ऐसे कई जनप्रतिनिधि हैं जो सदन में उपस्थित न होकर और चुप रह कर अपनी अकर्मण्यता सिद्ध करते हैं। फिर उनके पद पर बने रहने का क्या अर्थ है? इससे तो बेहतर है कि वे पद से हट जाएं ताकि कोई दूसरा योग्य व्यक्ति आकर जनता के काम को आगे बढ़ाए।

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