मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : हम पशु क्यों बनें?

तड़का : हम पशु क्यों बनें?

कविता श्रीवास्तव

भौंकना और लड़ाई करना कुत्तों का नैसर्गिक स्वभाव है। जब भी दो कुत्ते आमने-सामने होते हैं, वे अक्सर लड़ पड़ते हैं, लेकिन आदमी समझदार होता है। वह लड़ाई-झगड़े से बचता है। हमेशा कुत्तों की तरह लड़ नहीं पड़ता, बल्कि धैर्य से काम लेता है। लेकिन बीते दिनों इंदौर में पालतू कुत्तों की लड़ाई में दो परिवार भिड़ गए। नौबत यहां तक आई कि एक ने बंदूक उठाकर चला दी, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई और छह लोग घायल हो गए। कुत्तों की लड़ाई में मनुष्य का इस तरह का हिंसक हो जाना पशु प्रवृत्ति से कम नहीं है क्योंकि पशु को अपने किए के परिणाम का भान होता है या नहीं, नहीं पता, लेकिन हम अपने किए के परिणाम को जानते हैं। पशुओं में और हममें यही भिन्नता है। हम बहुत ही समझदारी से काम लेते हैं। सामाजिक परिवेश में रहते हैं। हिंसक न होने की बचपन से ही सीख पाते हैं। गलती होने पर सुधार करते हैं। शांति और धैर्य से काम लेते हैं। पशुओं के प्रति प्रेम रखना, उन्हें पालना कुछ लोगों का शौक होता है। पालतू पशु बच्चों की तरह, घर के सदस्य की तरह होते हैं इसलिए उनके खानपान, स्वास्थ्य, रहन-सहन के साथ ही उनकी सुरक्षा पर भी हम विशेष ध्यान देते हैं। घर से बाहर निकलने पर कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जिसका सामना दूसरे कुत्तों से हो ही जाता है। ऐसा होने पर दोनों कुत्ते एक-दूसरे पर भौंकते जरूर हैं। यही उनकी बोली है। कभी-कभी उन्हें आपस में खेलते भी देखा जाता है। लेकिन अक्सर वे लड़ाई भी कर लेते हैं। ऐसे वक्त में अपने पशु को संभालना चाहिए। दूसरे के पशु पर वह हिंसक न हो इसका ध्यान रखना चाहिए। लेकिन अगर दो पशुओं में लड़ाई हो जाए तो कम से कम मनुष्य को मनुष्य बने रहना चाहिए। लोग पशुओं को अलग कर ही देते हैं। एक-दूसरे से माफी मांग लेते हैं। अपने पशु को संभालें और दूसरे पशु के प्रति भी संवेदना रखें, तभी तो हम सच्चे पशुप्रेमी हो सकते हैं। लेकिन पशुओं को लेकर आपस में भिड़ जाना, हिंसक हो जाना यह मानव को शोभा नहीं देता। यह देख कर तो पशु भी अचंभित होते होंगे। यह समाज में अच्छा संदेश नहीं देता है। अपने शौक को अपनी सीमा में रखना सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। हमारा शौक दूसरों को तकलीफ न दे यह सुनिश्चित करना भी हमारा ही दायित्व है। हम बच्चों की गलतियों पर उन्हें हिदायत देकर छोड़ देते हैं, उनके माता-पिता को सचेत करते हैं। हमारा यही रुख पशुओं के मामले में भी होना चाहिए। किसी की जान पर बन आए ऐसे कदम उठाना अपराध है और स्वयं के लिए भी नुकसानदेह है। पशु तो मनुष्य नहीं हो सकता, फिर मनुष्य कभी-कभी न जाने क्यों पशु जैसा बन जाता है! यदि कोई तकलीफ है तो निराकरण के लिए शासन-प्रशासन की व्यवस्थाएं हैं। पर मनुष्य चाहे पट्टे से बांधे या पिंजरे में रख दे। कुत्तों का स्वभाव नहीं बदलता। कुत्ते आपस में फिर भी भौंकेंगे और लड़ेंगे। लेकिन हम उन जैसे नहीं हैं।

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