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तड़का: तेरा तुझको अर्पण!

कविता श्रीवास्तव
हम सब भगवान से क्या मांगते हैं? सुख, समृद्धि, शांति, समाधान और ढेर सारा आशीर्वाद। यही न! पर हम भगवान को देते क्या हैं? अपना श्रद्धाभाव। कुछ चढ़ावा। थोड़ा धर्म-कर्म, दान-दक्षिणा और सामाजिक उपकार के कुछ कार्य। लेकिन ईश्वर की सेवा में कुछ लोग अपना सर्वस्व न्योछावर करने से नहीं चूकते। वे अद्भुत प्रेरणा की मिसाल बन जाते हैं। अलीगढ़ के सत्यप्रकाश शर्मा ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर बन रहे भगवान के भव्य मंदिर की भव्यता बढ़ाने के लिए ४०० किलो के वजन का ताला बनाया है। यह ताला दस फीट ऊंचा है। हमारे कद से भी बड़ा। लगभग साढ़े चार फुट चौड़ा है। मोटाई भी नौ इंच से ज्यादा है। इसकी चाबी ही १५ किलोग्राम की है। अलीगढ़ में पीढ़ियों से हाथ से बनाए गए ताले काफी मशहूर हैं। शर्मा जी का पुश्तैनी कारोबार भी यही है। उन्होंने अपनी हस्तशिल्प कला की प्रेरणा से विशाल ताला बनाने का संकल्प लिया और एक साल की कड़ी मेहनत के बाद पत्नी रुक्मिणी के सहयोग से उसे पूरा कर लिया। यदि मंदिर ट्रस्ट ने इसे स्वीकार किया तो मंदिर परिसर में यह अद्भुत ताला श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखा जाएगा। अलीगढ़ के इस साधारण दंपत्ति ने अपनी बचत के एक लाख रूपए इसे बनाने में लगा दिए हैं। फिनिशिंग के लिए और खर्च करने हैं। उनका भाव यही है कि सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ है। इसलिए सब उसी को समर्पित करना है। ईश्वर भी तो यही करते हैं। हम उन्हें फूल, फल, मेवा, मिठाई, धन जो कुछ भी चढ़ाते हैं, ईश्वर उसमें से कुछ भी अपने लिए नहीं रखते। वे सारी वस्तुएं प्रसाद के रूप में हमें ही वापस मिल जाती हैं। इसी तरह ईश्वर ने हमें जो वस्तुएं दी हैं, उन सभी को अपना ही नहीं मानना चाहिए। क्योंकि जब हम चले जाएंगे, सारी वस्तुएं यहीं रह जाएंगी। इस ताले का निर्माण करके अलीगढ़ के शर्मा जी ने हमें यही प्रेरणा दी है। क्योंकि कहते हैं न दुनिया इसलिए चल रही है क्योंकि बुराइयां ही नहीं ढेर सारी अच्छाइयां भी हैं। ऐसे अनेक सेवाभावी लोग हैं, जिन्होंने बहुत से मंदिर बनवाए हैं। उनकी देखरेख करते हैं। अन्नक्षेत्र चलाते हैं। निर्धन परिवारों की कन्याओं का विवाह कराते हैं। अनाथ बच्चों को पालते हैं। बूढ़े-बुजुर्गों के लिए आश्रम चलाते हैं। लोगों को तीर्थ यात्रा कराते हैं। भाव यही है कि….तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा…!

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