मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : शालीन पोशाक है इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा

इस्लाम की बात : शालीन पोशाक है इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा

सैयद सलमान मुंबई

इस्लाम में पर्दे का काफी महत्व है। बुर्का मुस्लिम समाज की पहचान के तौर पर भी जाना जाता है और उनके संस्कार का हिस्सा भी है। हिजाब, नकाब, बुर्का जैसे कई पहनावे हैं जिसका इस्तेमाल मुस्लिम महिलाएं अपने चेहरे को ढंकने के लिए करती हैं। कुछ महिलाएं अपने सिर और बालों को ढंकने के लिए दुपट्टा या हिजाब पहनती हैं, जबकि अन्य बुर्का या नकाब पहनती हैं, जिससे उनका चेहरा भी ढंक जाता है। हालांकि, चेहरे को ढंकने और खुले रखने को लेकर कई बार मुस्लिम समाज में बहस चलती है। मुस्लिम मामलों के विशेषज्ञ कुरआन का हवाला देते हुए कहते हैं कि इस्लाम में महिलाओं के लिए यह जरूरी है कि वे अपना सिर ढंके। इस्लामी शिक्षा के अनुसार मुस्लिम महिलाओं को सलवार-कमीज के साथ केवल एक दुपट्टे की आवश्यकता होती है जो सीने और सिर को ढंकने के काम आए। दुपट्टा चाहे किसी भी रंग का हो, बस उसमें शालीनता होनी चाहिए। कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों की राय में बुर्का पहनना जरूरी नहीं है। यानी अगर दुपट्टा पहना जाए तो यह सिर के बालों को ढंकने के इस्लामी निर्देश को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। बहरहाल, दुनिया भर में मुस्लिम महिलाएं ज्यादातर सिर और बदन के दूसरे हिस्सों को जहां तक हो ढंके रखने का प्रयास करती हैं। वैसे आधुनिकता का रंग जैसे अन्य धर्म की महिलाओं पर चढ़ा है, उसके असर से मुस्लिम महिलाएं भी अछूती नहीं हैं।
यही बुर्का अब उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित एक कॉलेज की छात्राओं की वजह से विवादों में आ गया है जहां उन्होंने बुर्का पहनकर रैंप वॉक किया। सोशल मीडिया पर उनका वीडियो वायरल होते ही कई मुस्लिम संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। जमीयत उलेमा ने इसे पूरी तरह से गलत और मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने वाला बताया। जमीयत की तरफ से साफ कहा गया कि बुर्का किसी पैâशन शो का हिस्सा नहीं हो सकता। जमीयत ने बुर्का पहनकर रैंप पर चलने वाली लड़कियों से माफी मांगने को कहा। कर्नाटक में बुर्का और हिजाब का मुद्दा तो पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। बुर्का बैन के मुद्दे को भाजपा ने अपनी जीत बताते हुए विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि भाजपा वह चुनाव बुरी तरह हारी। अवाम ने भाजपा के ‘बांटो और राज करो’ के मुद्दे को पूरी तरह नकार दिया था। फिर भी इसी तरह के विवादित मुद्दे अन्य राज्यों में भी तलाशे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बुर्का पहनकर किया गया रैंप वॉक मुंहमांगी मुराद बनकर सामने आया। दरअसल, यह मुद्दा गरमाता ही नहीं अगर मुस्लिम तंजीमों ने इसे तूल न दिया होता। जाने-अनजाने मुस्लिम तंजीमें सांप्रदायिक शक्तियों के ट्रैप में आ गर्इं और उन्हें बैठे-बिठाए मुसलमानों को नीचा दिखाने का मौका मिल गया।
इस्लामी विधिशास्त्र की सभी चार विचारधाराओं यानी शाफई, हनफी, हंबली और मलिकी में साफतौर से बताया गया है कि मुस्लिम महिलाओं के बालों सहित पूरे सिर को ढंका जाना चाहिए। बुर्का, चादर, हिजाब, नकाब जो भी नाम दिया गया हो, इस्लाम में इस बात पर जोर दिया गया है कि पोशाक शालीन होनी चाहिए। किसी भी महिला के यहां तक कि मर्दों के भी शरीर के किसी हिस्से को खुला नहीं दिखाना चाहिए। इसका मतलब है कि मर्द हो या औरत उसे खुले जिस्म की नुमाइश नहीं करनी चाहिए। महिला को अगर पर्दे का हुक्म है तो पुरुषों को भी निगाह नीची रखने का हुक्म है। लेकिन पुरुष प्रधान समाज केवल महिलाओं वाली बात पर ही खासा जोर देता है। शालीन पोशाक इस्लाम का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह संस्कार है। उसका प्रदर्शन गलत है। तकनीकी तौर पर बुर्वेâ में की गई रैंप वॉक पर मुस्लिम तंजीमें गलत नहीं कह रहीं, लेकिन जिस तरह से वह कठोर बयान दे रही हैं उससे मुसलमानों का ही नुकसान हो रहा है। वह विवादों में घिरकर मजाक का पात्र बन जा रहे हैं। दरअसल, माहौल ही ऐसा बना दिया गया है कि मुस्लिम समाज से जुड़ा कोई भी मुद्दा हवा में उछालते ही सारे मूलभूत समस्याओं से जुड़े मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। पांच राज्यों के चुनाव में उठाए गए मुद्दे इसका उदाहरण हैं। मुस्लिम आरक्षण समाप्त करने का मुद्दा हो, कन्हैयालाल के बहाने मुसलमानों को टारगेट करना हो या खुलेआम मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए जैसी बात कहनी हो, निशाने पर मुस्लिम समाज ही रहा है। मुस्लिम समाज तुरुप का वह पत्ता है जिसका इस्तेमाल लगातार किया जा रहा है। मुसलमानों को इस चाल को समझना होगा और अनावश्यक मुद्दों पर बयानबाजी से बचना होगा। मुस्लिम महिलाओं को भी इस बात को समझना होगा कि उनकी एक-एक गलती पर विषधर राजनेताओं की नजर है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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