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इस्लाम की बात : शब्दजाल से मुसलमानों का शिकार

सैयद सलमान मुंबई
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सर्वे-सर्वे का खेल हो रहा है। राज्यवार सर्वे, देश भर में नेता की लोकप्रियता के आधार पर सर्वे, पार्टी आधार पर सर्वे, जीत-हार पर सर्वे। सर्वे कंपनियों की चांदी है। खासकर उन कंपनियों की जो किसी न किसी समाचार चैनल के साथ मिलकर सर्वे कर रही हैं। सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को लेकर सर्वे पर सर्वे हो रहा है। हर सर्वे में उन्हें सर्वे का बेताज बादशाह बताने की होड़ है। मुस्लिम समाज के बीच किए गए सर्वे में मोदी को मात्र ३ प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री पद पर देखने की इच्छा जताई है। वह व्यक्ति जिसके साथ मुसलमानों ने कभी जुड़ाव महसूस नहीं किया, वह व्यक्ति जो मुसलमानों को उनके कपड़ों से पहचानने, कब्रिस्तान और श्मशान के बीच अंतर करने की बात करता हो, वह व्यक्ति जिसने कर्नाटक चुनाव में केवल एक विशिष्ट धार्मिक नारा लगा कर मुसलमानों समेत अन्य अल्पसंख्यकों को हतोत्साहित किया हो, हमेशा धार्मिक कार्ड खेलता रहा हो, क्या मुसलमानों में वह लोकप्रियता की दौड़ में शामिल हो सकता है? यही नहीं ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें प्रधानमंत्री का मुसलमानों के प्रति और मुसलमानों का प्रधानमंत्री के प्रति पूर्वाग्रह साफ दिखता है।
सबसे बड़ी बात गुजरात में हुए दंगों को लेकर मुसलमानों के मन में मोदी की छवि नकारात्मक ही रही है। अब उसी छवि का ध्रुवीकरण में इस्तेमाल करने की योजना है। यह दिखाने का प्रयास होगा कि देखिए मुसलमान नहीं चाहते कि मोदी प्रधानमंत्री बनें इसलिए उनको प्रधानमंत्री बनाना अब हिंदुओं की जिम्मेदारी है। यही ध्रुवीकरण २००२ से जारी है। २०१४ से इसमें बढ़ोत्तरी की गई, २०१९ में और तल्खी आई अब २०२४ में उससे भी ज्यादा कड़वाहट घोली जा रही है। कर्नाटक चुनाव उसका उदाहरण है, जहां एक प्रयोगशाला तैयार की गई। हिजाब पाबंदी, लव जिहाद, टीपू सुल्तान विवाद, मुस्लिम आरक्षण खत्म करने की घोषणा, बजरंग दल पर पाबंदी की बात पर शब्दों से खेलकर बजरंग बली का नाम लेना जैसे कई कार्ड खेले गए, जिससे ध्रुवीकरण हो। लेकिन कर्नाटक की जनता ने घास नहीं डाली। अब छटपटाहट बढ़ गई है। ऐसे में डर यही है कि अगले आम चुनाव से पहले कोई और शगूफा छोड़कर मुसलमानों को और भी न अलग-थलग करने की बात हो।
मुसलमानों में लोकप्रिय न होने के बावजूद मोदी ने एक चाल जरूर चली है। उन्होंने मुसलमानों को आपस में बांटने का मंत्र ढूंढ़ निकाला। असल इस्लाम की रोशनी में देखा जाए तो मुसलमानों के बीच जातिविहीन समाज होना चाहिए। लेकिन देश में मुसलमानों के बीच जाति हमेशा से मौजूद रही है। यह एक ऐसा तथ्य है, जिससे हम आंखें नहीं मूंद सकते हैं। हिंदुओं के कमजोर तबके की तरह मुसलमानों के पिछड़े तबके के लोग भी अपनी अलग पहचान चाहते हैं। यही बात मोदी को अपने माकूल लगी। उन्होंने मुसलमानों में अगड़ा-पिछड़ा की राजनीति का कार्ड खेला। अशराफ बनाम पसमांदा के भेद को और भी शिद्दत से प्रचारित किया। अपने लोगों को पसमांदा समाज से संवाद साधने की बात कही, ताकि मुसलमानों में यह लड़ाई तूल पकड़े। राष्ट्रीय आधार पर जातीय जनगणना कराने की कांग्रेस की मांग पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री ‘इंडिया’ गठबंधन को बैकफुट पर लाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री का तर्क है कि अगर जाति जनगणना के आधार पर हिंदू समुदाय के लोगों को सारे अधिकार दिए जाने हैं तो कांग्रेस पार्टी या ‘इंडिया’ गठबंधन मुसलमानों के अधिकारों का बलिदान क्यों देने को तैयार हैं?
प्रधानमंत्री की यह कथित चिंता मुसलमानों को असमंजस में डालने के लिए काफी है। होता भी यही रहा है कि अनेक राजनीतिक दल भाजपा का डर दिखाकर मुस्लिम वोट हथियाने की कोशिश करते रहे हैं। जबकि वे मुस्लिम समुदाय के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व देने को लेकर गंभीर नहीं हैं। मुसलमान दोतरफा मार झेलता है। एक तरफ वह भाजपा का तुष्टिकरण का आरोप झेलता है, दूसरी तरफ टिकट मिले न मिले, मान-सम्मान मिले न मिले लेकिन भाजपा के प्रति दुराग्रह के कारण वह अपने आप गैर भाजपाई दलों के साथ खड़ा हो जाता है। उसका प्रतिनिधित्व दिन-ब-दिन कम ही होता जा रहा है। मोदी और भाजपा उसमें भी अगड़े-पिछड़े मुसलमानों का भेद कर मुसलमानों को आपस में लड़ाकर उन्हें विभिन्न दलों में बांट देना चाहते हैं। लोकतंत्र में किसी भी समाज को सत्ता में उसकी वाजिब हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। हालांकि ऐसा है नहीं। ऐसे में पसमांदा मुसलमानों को शब्दजाल वाला लॉलीपॉप रास आता है तो ३ प्रतिशत ही सही, मुसलमानों के बीच भाजपा और मोदी पहुंच ही जाएंगे और बाकी मुसलमान तितर-बितर होकर मतदान करेंगे। यानी मोदी और भाजपा ने शब्दजाल से मुसलमानों का शिकार करने का मन बनाया है। क्या मुस्लिम समाज इस बात को समझ रहा है?
(लेखक देश के प्रमुख प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं।)

 

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