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इस्लाम की बात : किसको है किससे खतरा?

सैयद सलमान
इस देश की राजनीति के खेल बड़े निराले हैं। यहां आजादी के बाद से ही एक ऐसा वातावरण तैयार किया गया, जिससे कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव बना रहे, ताकि दोनों को एक-दूसरे का भय दिखाया जाता रहे। ‘हिंदुओं को मुसलमानों से और मुसलमानों को हिंदुओं से खतरा’ है का राग अलापने वाली पार्टियों ने इस फॉर्मूले के दम पर जमकर सियासत की और आज भी कर रहे हैं। यह खेल आजादी से पहले २०वीं सदी की शुरुआत में खेला गया जब पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने टू-नेशन थ्योरी का प्रस्ताव रखा था। जिन्ना और अन्य मुस्लिम नेताओं का मानना था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग समूह हैं, जिनकी अलग-अलग धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है, इसलिए वे एक राष्ट्र के रूप में एक साथ नहीं रह सकते हैं। कुछ हिंदू नेताओं और संगठनों की भी यही राय थी। हालांकि, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित दारुल उलूम देवबंद से जुड़े मुफ्ती महमूद ने इसकी मुखालिफत की। मुख्तार अहमद अंसारी जैसे नेताओं ने जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत और देश विभाजन का विरोध किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मजलिस-ए-अहरार-उल-इस्लाम से संबंध रखनेवाली पृष्ठभूमि से आनेवाले नवाबजादा नसरुल्ला खान ने भी मुस्लिम लीग का विरोध किया था। मौलाना आजाद ने तो कांग्रेस के भीतर या बाहर किसी भी अन्य समकालीन नेता की तुलना में जिन्ना और उनके विचारों और प्रस्ताव का अधिक दृढ़ता से विरोध किया था। चाहे अल्पसंख्यक समुदाय हो या बहुसंख्यक समाज, तब कोई भी मौलाना आजाद की तरह कड़ा विरोध नहीं कर सका था। १९२३ में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के दौरान अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा था, ‘अगर कोई देवी स्वर्ग से उतरकर भी यह कहे कि वह हमें हिंदू-मुस्लिम एकता की कीमत पर २४ घंटे के भीतर स्वतंत्रता दे देगी, तो मैं ऐसी स्वतंत्रता को त्यागना बेहतर समझूंगा। स्वतंत्रता मिलने में होनेवाली देरी से हमें थोड़ा नुकसान तो जरूर होगा, लेकिन हमारी एकता टूट गई तो इससे पूरी मानवता का नुकसान होगा।’
आज पाकिस्तान के हालात किसी से छुपे नहीं हैं। जिन्ना का पाकिस्तान मुसलमानों का होकर भी आपसी संघर्ष की मिसाल बना हुआ है। साजिशें इस कदर कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कभी फांसी तो कभी प्लेन क्रेश में मारे जाते हैं। कभी विदेश भाग जाते हैं। जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो, जियाउल हक, मुशर्रफ इसका उदाहरण हैं। नवाज शरीफ अब भी देश से बाहर हैं। इमरान का भविष्य भी कोई बहुत अच्छा नहीं दिख रहा। कंगाल पाकिस्तान चीन जैसे देशों पर वह निर्भर है। हिंदुस्थान का विरोध करना और उस आधार पर विश्व बिरादरी में बेचारा बने रहने की कवायद करना उसकी रणनीति का अहम् हिस्सा है। जबकि हमारे देश में हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर एक नजीर कायम की है, जिसका लोहा पूरा विश्व मानता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में फिर वही नफरत की सियासत को हवा देने की कोशिश हो रही है। हाल के वर्षों में, बहुसंख्यक हिंदुओं को अल्पसंख्यक मुसलमानों का डर दिखाया जा रहा है। आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से ‘इस्लामोफोबिया’ का हव्वा इस कदर तैयार किया गया है कि दो समुदाय एक दूसरे से दूरियां बना लें।
आज देश की लगभग ३० प्रतिशत हिंदू आबादी के मन में यह बात डाल दी गई है कि देश में हर समस्या का कारण मुसलमान हैं। आश्चर्यजनक तौर पर आबादी का एक हिस्सा इसे सच भी मान रहा है। दूसरी तरफ मुसलमानों में भी हिंदुओं का भय बिठा दिया गया है। मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं इस भय को बढ़ावा देती हैं। देश में हिंदू आबादी लगभग ९६ करोड़ और मुसलमानों की आबादी १७ करोड़ के आसपास है। अब अगर आबादी का इतना बड़ा हिस्सा सारी समस्याओं का कारण है तो फिर इसका कोई समाधान भी होगा। तमाम मुसलमानों से पिंड छुड़ा लेना, उन्हें देश से अलग कर देना या उनका सामूहिक कल्त कर देना मुमकिन नहीं है तो फिर क्यों न मुसलमानों और हिंदुओं के बीच चल रहे सियासी विवाद का कोई हल निकाला जाए। क्या यही एक उपाय नहीं है? जो सबसे आसान और दूरगामी परिणाम देनेवाला है। इससे देश की एकता भी बरकरार रहेगी, देश से वैमनस्य खत्म होगा, देश हित के कार्य होंगे, देश तरक्की करेगा, समाज में दिन-प्रतिदिन बढ़ रही उथल-पुथल शांत होगी जो समाज और राष्ट्र के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। हां, यह जरूर है कि उसके लिए नफा-नुकसान की मानसिकता से हटकर राजनीतिक परिपक्वता और निष्पक्षता की दरकार होगी। अगर इतना साहस है तो आगे बढ़कर समस्या का समाधान ढूंढ़ा जाए और एक दूसरे का भय दिखाना बंद किया जाए।
(लेखक देश के प्रमुख प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं।)

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