मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : योग बन चुका है विज्ञान का हिस्सा!

इस्लाम की बात : योग बन चुका है विज्ञान का हिस्सा!

  • मुसलमानों को नजरिया बदलने की जरूरत है

सयैद सलमान 

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस आया और बीत गया। विश्वभर में कई कार्यक्रम हुए। इस साल कार्यक्रम को `मानवता के लिए योग’ विषय के तहत मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए प्राचीन योग को समर्पित दिवस मनाने के लिए २०१५ में एक प्रस्ताव पारित किया था, तब से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। लेकिन इस बार भी इस्लामी चरमपंथी विचार के माननेवालों ने इस दिन को विवादित बना दिया। सबसे ज्यादा विवाद मालदीव की राजधानी माले में हुआ, जहां भारतीय उच्चायोग के राजनयिकों और सरकारी अधिकारियों सहित १५० से अधिक लोग अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनानेवाले जिस कार्यक्रम में भाग ले रहे थे, वहां कट्टरपंथियों के एक समूह ने बाधा पहुंचाने का प्रयास किया। भीड़ ने तख्तियां लहराते हुए योग को इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। आखिर मामले को बढ़ता देख बाद में पुलिस को लोगों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और काली मिर्च के स्प्रे का इस्तेमाल करना पड़ा। हिंद महासागर में द्वीपों के एक समूह मालदीव की आबादी साढ़े पांच लाख के करीब है और यहां इस्लाम को राजकीय धर्म के रूप में पेश किया गया है। ऐसे में योग का विरोध, मुसलमानों को लेकर लोगों में और भी गलत संदेश दे रहा है। इसी बीच सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों ने योग दिवस कार्यक्रम को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताते हुए विरोध भी किया। ‘योग इज शिर्क ’ और ‘योग इज नॉट इस्लामिक’ जैसे तर्कों के साथ, कट्टरपंथियों ने मुसलमानों से इस प्रथा का पालन न करने का आग्रह किया। रोचक तथ्य यह है कि हमारे दो पड़ोसी देशों ने इस कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर मनाया। पाकिस्तान और बांग्लादेश में उत्साह के साथ योग कार्यक्रम आयोजित किए गए। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर इन दोनों देशों में यह संदेश देने की कोशिश हुई कि योग सबके जीवन को खुशहाल और स्वस्थ बनाता है। अच्छी बात यह भी रही कि बड़े पैमाने पर मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों ने भी योग विरोध को धर्म से जोड़ने के कृत्य की निंदा की। कुछ लोगों ने जवाब में योग करने की क्रिया को ही ‘चरमपंथी’ करार दे दिया है। यह विवाद दरअसल योग और धर्म की आड़ लेकर द्वेष पैदा करने के लिए किया गया है। मुस्लिम समाज में योग विवाद उठने पर कई मुस्लिम रहनुमाओं ने स्पष्ट संदेश दिया कि योग के विषय में मुसलमानों की सोच पर शक करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि दुनिया के लगभग ४५ इस्लामी मुल्कों ने २१ जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की परंपरा को पूरी तरह से अपना लिया है।
इस विवाद के जन्मदाताओं को यह समझने की जरूरत है कि योग को धार्मिक दृष्टिकोण से देखा ही नहीं जाना चाहिए। यह हमारे अपने देश की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान है और इसके स्वास्थ्य से जुड़े महत्व को आज पूरा विश्व अपनी स्वीकृति दे रहा है। यह हमारे देश के लिए गौरव की बात है। इसमें मुसलमानों को शरीक होने से रोकने की कोई तार्किक  दलील नहीं है। यह भी सच है कि मुस्लिम समाज की बड़ी संख्या योग को सनातन या हिंदू धर्म का हिस्सा समझकर इससे दूर रहती है। ये भ्रांति कोई नई बात नहीं है। यह बरसों से चली आ रही है और अब जितना लोग इसे अपनाने पर जोर दे रहे हैं, इसका विरोध भी उतना ज्यादा होने लगा है। जहां तक योग का सवाल है तो उसे अगर एक व्यायाम के रूप में प्रचारित किया जाए तो शायद मुसलमानों की गलतफहमी को दूर किया जा सकता है। दूसरी तरफ से उसे धर्म से जुड़ा हुआ बताने की वजह से मुसलमान योग से दूर भागने लगता है। योग को इस तरह से पेश किया जाए कि यह स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है तो विरोध की धार ही कुंद  पड़ जाएगी लेकिन उसके लिए किसी ऐसी क्रिया को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए, जिसे दूसरे धर्म के लोग स्‍वीकार न कर सकें। जरूरी बात यह है कि योग को राजनीतिक स्टंट नहीं बनाना चाहिए। अफसोस की बात यह है कि ऐसा हो रहा है।
कुछ वर्ष पहले यूएई के दुबई में योग पर बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। सम्मलेन काफी सफल रहा था। उस वक्त योग से जुड़े कई मिथ को दूर करने की कोशिश की गई थी, जिसके सार्थक नतीजे भी आए थे। योग को सीधे स्वास्थ्य से जोड़ देने का परिणाम ही था कि कई अरब देशों ने अपने नागरिकों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए योग को अपनाने की अपील की थी। अरब देशों के मुसलमानों के अपनाने से प्रेरित होकर यहां के मुसलमानों में भी योग को लेकर सकारात्मकता देखी गई और मुसलमानों के ऐतराज में भी कमी आई। इसका नतीजा यह रहा कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया। यह समझने की जरूरत है कि योग का संबंध सिर्फ  व्यायाम और शरीर से ही नहीं बल्कि मानसिक शांति से भी है। योग का संबंध सांसों के नियंत्रण से है। योग का संबंध शरीर के अंग-प्रत्यंग में ऊर्जा भरने से है। योग का संबंध तन-मन को स्वस्थ रखने से है। हां, जब इसे इबादत के रूप में प्रचारित किया जाता है, तभी शायद मुसलमान आपत्ति जताता है क्योंकि इस्लामी मान्यताओं के हिसाब से मुसलमान सिर्फ  एकेश्वर की इबादत करते हैं। अगर ईमानदारी से मुसलमानों को यह समझाया जाए कि योग केवल व्यायाम नहीं बल्कि विज्ञान का हिस्सा बन चुका है तो वे इसे आसानी से अपना लेंगे।
दरअसल योग किसी खास मजहब से संबंधित है ही नहीं बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रकिया है, जिसे करने से चित्त शांत और शारीरिक लाभ होता है। योग की विशेषता है कि वह मन की चंचलता पर रोक लगाता है और ईश्वर के ध्यान में मदद करता है। मिस्र के इतिहास में योग को `इस्लामी व्यायाम’ करार दिया गया था। ऐसी मान्यता बना दी गई थी कि `नमाज’ दरअसल एक प्रकार से `योग’ है। `योग’ करनेवाले बताते हैं कि योग करने से मन-मस्तिष्क पर संयम रखा जा सकता है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि अगर सही तरीके से पढ़ी जाए तो `नमाज’ में भी यही होता है। हां, यह जरूर है कि नमाज का कोई बदल नहीं हो सकता। वह पूरी तरह से इबादत है। लेकिन नमाज पढ़ने के दौरान की गई कई प्रक्रियाएं योग से मेल खाती हैं। नमाज के दौरान कयाम, रुकू, सजदा और सलाम फेरना जैसे कई अरकान अदा करने से सिर से पांव के अंगूठे तक का व्यायाम हो जाता है। नमाज के ये सारे अरकान मूल रूप से व्यायाम तो नहीं हैं लेकिन इसे नमाज पढ़ने का अतिरिक्त लाभ जरूर कहा जा सकता है। नमाज में भी एक प्रकार से `ध्यान’ ही लगाया जाता है और योग में भी `ध्यान’ का महत्व होता है। नमाज से पहले की गई `नीयत’ योग करने से पहले लिए गए `संकल्प’ की याद दिलाती है। नमाज में `कयाम’ की स्थिति बिल्कुल `वङ्काासन’ से मिलती जुलती है। `सजदा’ करने की प्रक्रिया योग के `शशांक आसन’ के समान लगती है। इस प्रक्रिया से हृदय गति और रक्तचाप को नियंत्रित रखा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए मुसलमानों को योग से भागना नहीं चाहिए। जिन उच्चारणों को करने से आपत्ति है भी, वह कोई उनसे जबरदस्ती करवाता भी तो नहीं है। शायद इसीलिए अब कई इस्लामिक देशों में योग को गलत नहीं माना जाता। इस्लामी लिहाज से अदा की गई नमाज से योग की तरह ही शरीर और मन को तरोताजा रखा जा सकता है। बस एक बार नजरिया बदलने की जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है। 

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