चाय का बहाना

चाय पे बुलाना तो एक बहाना था
दरअसल इरादा तो तुझे अपनी बातों से हंसाना था
तुझे हंसते देख, देखते रह जाना था
तुझे दर्द के दलदल से बाहर निकालना था।
तेरी आंखों की चमक को ढूंढ के लाकर, फिर से उन्हें सजाना था।
तेरी गालों पर पड़ते डिंपल को आंखों से सहलाना था।
तेरी लट्ठों को हवा से उलझते देख, मन-मन सुलझाना था।
काश तुम ये समझ लेती
की चाय तो बस एक बहाना था।

 नैंसी कौर,  दिल्ली

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