मुख्यपृष्ठनए समाचारटीम गुजरात ने यूपी के क्षत्रपों को द्वंद युद्ध में झोंक कर...

टीम गुजरात ने यूपी के क्षत्रपों को द्वंद युद्ध में झोंक कर कार्यकर्ताओं को किया भ्रमित 

मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ

‘फूट डालो और राज करो’ का सही इस्तेमाल करने में माहिर टीम गुजरात ने यूपी में भाजपाइयों को दो खेमों में बांट कर भिड़ा दिया है। एक धुरी पराक्रमी हिंदुत्व के ब्रांड एम्बेस्डर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो दूसरी धुरी कार्यकर्ताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य बन गए हैं। कारण जो भी हो, लेकिन यह विभाजन दिखने लगा है। यह अलगाव दिखे इसके लिए टीम गुजरात कोई अवसर खोने के मूड में भी नहीं है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और उसके परिणाम के बाद गुजरात नेतृत्व की अकड़ बढ़ गई है। तीन राज्यों में भाजपा की सरकार बनी, लेकिन गुजराती सर्जनों द्वारा जमें-जमाए राज्य स्तरीय नेतृव की नसबंदी कर दी गई। टिकट वितरण के समय ही पार्टी के कर्ता-धर्ता जिस नीति पर चले उसका एक ही संदेश था कि सामान्य कार्यकर्ता हो या राज्य स्तरीय क्षत्रप सब एक बराबर हैं। अपने-अपने राज्यों में जो कभी टिकट बांटते थे वह अपने टिकट को लेकर असहाय हो गए थे। राजस्थान में पूर्व वसुंधरा राजे सिंधिया, मध्यप्रदेश में निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज चौहान और छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने-अपने टिकटों के लिए झेल गए। भाजपा नेतृत्व को बस एक बात का भय था कि राज्य स्तरीय दिग्गजों की ज्यादा बेइज्जती करने से कहीं स्थानीय कार्यकर्ताओं में आक्रोश न फैल जाए। इसकी काट के लिए वह एक तरफ तो निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं को पुचकारते थे दूसरी तरफ नामी नेताओं को सरेआम हाशिए पर ढकेलने का प्रदर्शन करते थे। अपमान के भय से राज्य स्तरीय क्षत्रप सार्वजनिक कार्यक्रमों से कटने लगे। वह उचित समय पर पहुंच कर उचित स्थान लेकर सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर पार्टी का काम किए। टीम गुजरात तीनों राज्यों में यह संदेश दिया गया कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं है। 26 लोकसभा, 182 विधानसभा सीट और 5 करोड़ गुजरातियों के सम्मान की बात करने वाले नरेंद्र मोदी अनुशासन के नाम पर 80 लोकसभा, 403 विधानसभा सीट और 25 करोड़ की आबादी वाले राज्य पर न केवल राज कर रहे हैं, बल्कि यूपी के स्थानीय क्षत्रपों को घुटने पर ला दिया है। भाजपा की दृष्टि से इन चुनावों की विशेषता यह थी कि स्थानीय नेता जूझे तो जी जान से, लेकिन विजयोत्सव के प्रेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमितशाह रहे।
भाजपा पर काबिज मोदी-शाह की जोड़ी की परेशानी यह है कि राज्य स्तरीय नेताओं की हैसियत ध्वस्त करने की सफल रणनीति के बाद भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुजरात टीम की धौस में नहीं आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पसरे राजनैतिक सन्नाटे के बीच हर कोई संसय में है। लोग चर्चाओं में कह रहे हैं कि कुछ बड़ा होने वाला है।दबी जुबान से एक-दूसरे से बड़े-बड़े मंत्री कह रहे हैं कि कुछ भी हो सकता है। ताजा सुगबुगाहट जो पैदा की जा रही है वह यह है कि यूपी में भी परिवर्तन किया जा सकता है। उसके पीछे केवल एक कारण बताया जा रहा है कि अब योगी भाजपा में अकेले ऐसे क्षत्रप बचे हैं, जो गुजरात टीम के अधीनता स्वीकार नहीं किया हैं। कानून व्यवस्था और हिंदुत्व पर योगी आदित्यनाथ ने जो लाइन खिंचा हैं वह भाजपा नेतृत्व (टीम-गुजरात) भी अपने राज्य में नहीं खींच पाया। गोधरा कांड के बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इवेंट्स कंपनियों के माध्यम से हिंदुत्व का जो धुंआ फैलाया। वह उन्हें केंद्र की सत्ता तक पहुंचा दिया। जिसे गुजरात मॉडल का नाम देकर मोदी के थैली कथित थैली शाह अंबानी-अडानी और स्टार बन कर उभरी स्मृति ईरानी ने स्थापित किया। इसके विपरीत बिना अपने प्रशासनिक पराक्रम व प्रचंड हिंदुत्व की हुंकार से योगी ने राज्य में बिना कोई दंगा हुए हिंदुत्व के मान दंड का झंडा बुलंद कर उससे ज्यादा हिंदुत्व का ताप बढ़ाया। योगी के पीछे न कोई थैलिशाह (अंबान-अडानी) और न कोई मुंबई की फिल्मी चका-चौंध का चेहरा (स्मृति ईरानी) था। टीम गुजरात की लाख सजगता और गुप्त प्रतिरोध के बाद भी योगी आदित्यनाथ के ईमानदारी और हिंदुत्व की धमक देशव्यापी हो गई। इसी कारण योगी के हिंदुत्व और कानून व्यवस्था पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी मुहर माना जाता है।
सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से समय के लिए कई प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री व राज्यों के प्रमुख नेता समय मांगते हैं, लेकिन उन्हें समय लेने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। उत्तर प्रदेश के नेताओं को झट-पट भेंट होने के साथ सोशल मीडिया पर फोटो वायरल करने की होड़ लग जाती है, यह एकात्म मानववाद की सहज उपासना के संकेत नहीं हैं। इस बीच गौर करने वाली बातें यह थी कि पिछले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे ही राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, गृहमंत्री अमितशाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से औपचारिक भेंट किए आनन-फानन में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी इन नेताओं से मिलने का समय तय करके सदिच्छा भेंट किए। दोनों नेताओं की मुलाकात की एक चीज कॉमन थी वह ये कि दोनों ने अपने-अपने भेंट की फोटो सोशल मीडिया पर पूरी ताकत से वायरल कराया। इस कड़ी में तीसरा नाम कई दलों की राजनैतिक दांव-पेंच की काट का अनुभव रखने वाले उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का भी नाम जुड़ गया है। बीते मंगलवार को प्रस्तावित राज्य मंत्रिमंडल की कैबिनेट बैठक छोड़ कर उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमितशाह से मिलने जाना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश भाजपा की संगठनात्मक इकाई को दूर रखा जा रहा है। संत प्रवृत्ति के संगठन मंत्री धर्मपाल और खरी-खरी कहने वाले प्रदेश अध्यक्ष चौधरी भूपेंद्र सिंह को इस ताबड़तोड़ भेंट अभियान में शामिल नहीं किया गया है। अभी तक सत्ता बनाने की सूझ-बूझ में माहिर टीम गुजरात चाहे जितना कसरत कर ले उसे जातीय जनगणना के मुद्दे पर यूपी-बिहार में जूझना ही पड़ेगा। जो इस क्षेत्र में भाजपा के स्थापित प्रतिद्वंद्वी दलों का प्रमुख मुद्दा है।
इस दौरान बार-बार यह प्रदर्शित किया गया कि यूपी और बिहार में राजनैतिक उफान मार रहे जातीय जनगणना पर यूपी भाजपा बंट हुई है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सत्ता बनने पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जीत पर दिए गए अपनी पहली प्रतिक्रिया में जातीय जनगणना के मुद्दे को नकारते हैं, उसी दिन पटना पहुंचे गृहमंत्री जातीय जनगणना के मुद्दे पर समर्थन व्यक्त करते हैं। यूपी में मुख्यमंत्री योगी जोर-शोर से जातीय जनगणना को लेकर हिंदू समाज में विखराव होने, कमजोर करने की बात करते हैं तो उपमुख्यमंत्री नंबर एक केशव प्रसाद मौर्य जातीय जनगणना की वकालत करते हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि गृहमंत्री अमितशाह खुलेआम उनके पाले में खड़े होकर जातीय जनगणना के मुद्दे का समर्थन करते हैं। चुनावी मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ताल ठोक कर पिछड़ा होने की बात करते हैं, लेकिन अभी वह सबको बुला-बुला कर अलग-अलग मिल रहे हैं। इस मुद्दे पर वह किसके साथ हैं अभी तक मुंह नहीं खोले हैं, लेकिन पिछड़ों और अतिपिछड़ों के मुद्दे पर सहानभूति दांव चलने वाले नरेंद्र मोदी अभी राजनैतिक ताप को बढ़ाने में मौन समर्थन देते दिख रहे हैं। राष्ट्र और हिंदुत्व के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से इस मुद्दे पर कोई अधिकृत टिप्पड़ी नहीं आई है। संघ में बैठे बड़ी जातियों के वर्चस्व वाले राष्ट्रवादी लोग मोदी के पिछड़े और अतिपिछड़ेवाद के तीर से घायल तो हैं, लेकिन भीतर की चोट ऊपर नहीं आने से रहे हैं।

अन्य समाचार