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मानसिक इलाज का ‘टेलीमानस’ आधार! …एक साल में १४,००० से अधिक ने किया संपर्क

• लोग डिप्रेशन के हो रहे शिकार

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई  
वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मामले काफी तेजी से बढ़ते हुए देखे जा रहे हैं। विशेषकर कोरोना संक्रमण के बाद से इसका जोखिम और भी बढ़ा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सभी उम्र के लोगों में मानसिक स्वास्थ्य विकार के मामले दर्ज किए जा रहे हैं। हालांकि, हिंदुस्थान में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बना टैबू अब भी लोगों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने में बाधा बन रहा है। कुछ यही स्थिति महाराष्ट्र में भी जहां बिगड़ रहे मानसिक स्वास्थ्य के बावजूद कई लोग डॉक्टर के पास जाने से हिचकते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए राज्य में अक्टूबर २०२२ से ‘टेलीमानस’ पहल शुरू की गई है, जो लोगों के मानसिक इलाज का आधार बनता जा रहा है। इस पहल को नागरिकों का भी अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। इसी क्रम में महज ११ महीनों में राज्य के १४,८७७ नागरिकों ने ‘टेलीमानस कॉल सेंटर’ से संपर्क किया है और इलाज कराया है।
बदलती जीवनशैली, काम का बढ़ता दबाव, बेरोजगारी, परीक्षा में असफलता, घरेलू कलह जैसे विभिन्न कारकों के कारण नागरिकों में मानसिक तनाव का स्तर बढ़ रहा है। इसकी वजह से कई लोग डिप्रेशन के शिकार हो गए हैं। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने का आमतौर पर यह मतलब माना जाता है कि संबंधित व्यक्ति पागल हो गया है। इसलिए कई लोग अवसादग्रस्त होने के बावजूद मनोचिकित्सक के पास जाने के लिए तैयार नहीं होते हैं। नागरिकों का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए, इसलिए पहचान छुपाते हुए मानसिक तनाव से पीड़ित नागरिकों के इलाज के लिए स्वास्थ्य विभाग ने ‘टेलीमानस’ पहल शुरू की है। ‘टेलीमानस’ कॉल सेंटर पर कॉल करने के बाद नागरिक को वहां के परामर्शदाताओं और डॉक्टरों द्वारा उचित मार्गदर्शन और सलाह दी जा रही है। साथ ही कॉल करनेवाले की पहचान भी गोपनीय रखी जा रही है। इसलिए पिछले ११ महीनों में ‘टेलीमानस को नागरिकों से अच्छा प्रतिसाद मिला है। अब तक राज्य के १४,८७७ नागरिकों ने टेलीमानस सेंटर के जरिए अपना मानसिक उपचार कराया है।
बच्चों-युवाओं में बढ़ रही मानसिक समस्याएं
विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में बच्चे और युवा भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का अनुभव कर रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक कलंक और नकारात्मक दृष्टिकोण, युवाओं को मदद प्राप्त करने में बाधा बन रही है। इसके अलावा देश में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की सहज उपलब्धता की कमी भी इस संबंध में जोखिमों को बढ़ानेवाली हो सकती है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण २०१५-१६ के अनुसार, १८ वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में ये स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहा है।
बुजुर्ग डिमेंशिया के हो रहे शिकार
जानकारी के मुताबिक, ४६-६० की आयु वाले लोगों में मानसिक स्वास्थ्य विकार के मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इस आयु वर्ग वाले ज्यादातर लोग डिप्रेशन और पारिवारिक समस्याओं के साथ डिमेंशिया के शिकार देखे जा रहे हैं, वहीं ६० साल से अधिक लोगों में डिमेंशिया, याददाश्त से संबंधित दिक्कत और पारिवारिक समस्याएं अधिक देखी जा रही हैं।

पश्चिम महाराष्ट्र से आई सबसे अधिक कॉल
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, ‘टेलीमानस’ सेंटरों में पश्चिम महाराष्ट्र से सबसे अधिक कॉल प्राप्त हुई हैं। यहां से कुल ५,६१८ कॉलें प्राप्त हुई हैं। इसमें कोल्हापुर से १,७९९ कॉल आई है, उसके बाद पुणे से १७४४, सांगली से १६२९, सातारा से ४४६, मुंबई और उसके उपनगरों से ९५७, संभाजीनगर से ९३०, बीड से ७४४, नासिक से ५८८ और धाराशिव से ५७१ कॉलें आई हैं, जबकि नंदुरबार जिले में सबसे कम ५६ कॉल आई हैं।

देश में हर पांच में से एक को है समस्या
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि देश में हर पांच में से एक व्यक्ति को भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याएं हैं। देश में करीब ६० से ७० मिलियन लोग सामान्य और गंभीर मानसिक विकारों से पीड़ित हैं। एक वर्ष में आत्महत्या के मामले भी बढ़े हैं। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े कहते हैं कि हिंदुस्थान में प्रति एक लाख लोगों पर आत्महत्या की औसत दर १०.९ है। इस तरह के जोखिमों को देखते हुए मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

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