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मध्यांतर : एमपी भाजपा में खींचतान शिवराज सिंह परेशान! नहीं घोषित कर पा रहे हैं महापौर के उम्मीदवार

प्रमोद भार्गव

भाजपा को १६ नगर निगमों के उम्मीदवार घोषित करने में नाको चने चबाने पड़ रहे हैं। जबकि कांग्रेस तीन दिन पहले ही प्रत्याशियों के नाम घोषित कर चुनाव की मैदानी तैयारी में जुट गई है। भाजपा दिग्गज नेताओं की आपसी खींचतान के चलते प्रदेश संगठन के स्तर पर कोई भी नाम तय नहीं कर पाई। नतीजतन प्रत्याशी चयन का मामला केंद्रीय  नेतृत्व के पास ले जाना पड़ा है। स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान संभावित प्रत्याशियों की सूची लेकर दिल्ली गए थे लेकिन अब कुछ दिशा-निर्देश लेकर लौट आए हैं और अब प्रदेश भाजपा में मंथन चल रहा है। शिवराज सिंह चौहान भाजपा की अंदरूनी खींचतान से बहुत परेशान हैं। वे इतने मजबूर हो गए हैं कि महापौर के उम्मीदवारों का नाम नहीं तय कर पा रहे हैं। दो किस्तों में उम्मीदवारों की सूची जारी हुई। पार्टी में सर्वाधिक विचार-विमर्श भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और सागर में कशमकश ज्यादा है। नामों का चयन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा, भोपाल सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मंत्री विश्वास सारंग, विधायक कृष्णा गौर और रामेश्वर शर्मा सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकों का सिलसिला जारी है। इधर जिला कोर कमेटियों को संगठन ने निर्देश दिए हैं कि पार्र्षद पद के उम्मीदवारों के नाम सहमति बनाकर संभागीय समिति को भेजें। उम्मीदवारों के चयन में जीत की संभावना के साथ सामाजिक और स्थानीय समीकरणों का ध्यान रखा गया है।
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के साथ-साथ मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों के चुनाव भी हो रहे हैं। नगरीय निकायों के चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ होंगे और पंचायत के बिना पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ होंगे। इसलिए नगरीय निकायों में मारामारी अधिक है। एक-एक पार्षद की सीट के लिए १०-१० उम्मीदवार दावेदारी कर रहे हैं। यही स्थिति महापौर के टिकट के लिए है। महापौर का चुनाव सीधे मतदाता करेंगे। जबकि नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव पार्षद के वोट से होगा। यही तरीका नगर परिषद के चुनाव में अपनाया गया है। कुल १६ महापौर और ३४७ नगरपालिका व नगरपरिषद के अध्यक्ष चुने जाएंगे। हालांकि इन पदों की कुल संख्या ४१३ है लेकिन अन्य पर बीच-बीच में चुनाव होते रहे हैं इसलिए पद भरे हुए हैं। कुल ६,५०७ पार्षद पद के लिए चुनाव होंगे। निकाय चुनाव का मतदान दो चरणों में होगा। पहला चरण छह जुलाई और दूसरा १३ जुलाई को संपन्न होगा। चुनाव की अधिसूचना ११ जून को राज्य निर्वाचन आयोग ने जारी कर दी है। इसी के साथ नामांकन पत्र दाखिल करने का सिलसिला चल पड़ा है। १८ जून तक नामांकन पत्र भरे जाएंगे।
टिकट वितरण में पेंच क्षेत्रीय क्षत्रप उलझा रहे हैं। ग्वालियर में ज्योतिरादित्य सिंधिया और खनिज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपने उम्मीदवार उतारना चाहते हैं। भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की इच्छा है कि उनके इच्छानुसार उम्मीदवारी तय हो। जबलपुर में प्रदेश पार्टी अध्यक्ष वीडी शर्मा अपना उम्मीदवार चाहते हैं। वहीं सागर में मंत्री गोपाल भार्गव अपना उम्मीदवार लाना चाहते हैं। जबकि केंद्रीय  संगठन से मिले दिशा-निर्देशों के अनुसार आम सहमति से प्रत्याशी चयन को कहा गया है। शिवराज और वीडी शर्मा आम सहमति से उम्मीदवार उतारने के पक्ष में हैं लेकिन सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर और मुरैना में खासतौर से पेंच फंसाए हुए हैं। इनके द्वारा दिए गए नामों पर मंथन जारी है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव और प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा भी सहमति बनाने में लगे हुए हैं।
हालांकि प्रदेश और केंद्रीय  नेतृत्व को अधिकांश टिकट शिवराज की मंशा के अनुसार देने चाहिए क्योंकि मध्यप्रदेश में आम मतदाता पर तो उनका व्यापक प्रभाव है ही, सरकारी मशीrनरी भी उनके अनुसार चलने की इच्छा रखती है। प्रदेश नेतृत्व भी उनसे बाहर नहीं है। उनकी इस समावेशी कार्यशैली के प्रशंसक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रहे हैं। वे सार्वजनिक रूप से शिवराज की प्रशंसा कर चुके हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह भी शिवराज को महत्व देते हैं। इसी वजह से पार्टी संगठन, विधायक और सांसद के टिकटों का निर्णय अब तक प्रदेश में ही तय होता रहा है। केवल केंद्र  से औपचारिक स्वीकृति ली जाती रही है। परंतु इस बार भाजपा को महापौर के टिकट तय करने में अतिरिक्त परेशानी पेश आ रही है। इसका मुख्य कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया की सामंती ठसक है। अतएव वे अन्य नेताओं से न तो घुल-मिल पाते हैं और न ही सहमति से निर्णय लेने के पक्ष में रहते हैं। हालांकि इस विषय पर आधिकारिक रूप से कोई भी नेता बोलने को तैयार नहीं है।
टिकट वितरण के दौरान ही भाजपा को एक बड़ा झटका लगा है। प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया के पुत्र सिद्धार्थ मलैया ने अचानक पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया है। उन्हें अप्रैल २०२१ में विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी राहुल सिंह की हार का जिम्मेदार ठहराते हुए पार्टी आलाकमान ने जिला प्रशिक्षण संयोजक के पद से निलंबित कर दिया था। वे बीते एक साल से निलंबित चल रहे हैं, जबकि कई बार संगठन के पास जाकर वे अपना पक्ष रख चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं होने से उन्होंने निकाय चुनाव के बीच त्याग पत्र दे दिया है। आगे उनकी क्या भूमिका रहेगी, अभी यह स्पष्ट नहीं है। इधर जयंत मलैया ने बेटे के निर्णय को उचित बताया है।
हालांकि इस कमी की भरपाई भाजपा ने समाजवादी पार्टी के बिजावर सीट से विधायक राजेश कुमार शुक्ला और भिंड से बसपा विधायक संजीव सिंह को पार्टी में शामिल करने का निर्णय लगभग ले लिया है। तीन दिन के भीतर इन्हें समारोहपूर्वक भाजपा में शामिल कर लिया जाएगा। मध्य प्रदेश में यह रणनीति १८ जुलाई को होने जा रहे राष्ट्र्रपति चुनाव के मतदान के मद्देनजर अपनाई गई है। इनके आने से मध्य प्रदेश से भाजपा समर्थित २६२ मतों का मूल्य बढ़ जाएगा। सोमवार को संजीव और राजेश ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा से बंद कमरे में मुलाकात की। इस दौरान संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा भी मौजूद थे। दरअसल भाजपा राष्ट्रपति के चुनाव में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती इसलिए वह अन्य दलों के विधायकों को भाजपा में शामिल करने में लगी है। इस उलटफेर  ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस घटनाक्रम को नगरीय निकाय चुनाव के साथ-साथ २०२३ में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पूर्व भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन राजनीति के जानकार बताते हैं कि इससे भाजपा को जितना फायदा नहीं होगा, उससे कहीं ज्यादा नुकसान होगा। कारण साफ है कि बाहर के लोग भाजपा में रहे हैं जबकि पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता उपेक्षा झेल रहे हैं। मूल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के कारण ही पार्टी में कभी भी असंतोष का विस्फोट हो सकता है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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