मुख्यपृष्ठस्तंभमेहनतकश : टैक्सी की बदौलत परिवार को पहुंचाया बुलंदियों पर

मेहनतकश : टैक्सी की बदौलत परिवार को पहुंचाया बुलंदियों पर

अशोक तिवारी

मुंबई की सड़कों पर ऐसे बहुत से मेहनतकश मजदूर मिल जाएंगे, जो जिंदगी भर खुद तो मजदूरी करते रहे लेकिन अपने परिवार को उन्होंने अपनी मेहनत के बलबूते कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। परिवार को कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचाने के बावजूद उन्होंने अपने परंपरागत पेशे को नहीं छोड़ा और अपने पेशे से आजीवन जुड़े रहने की भी वे शपथ ले चुके हैं। कुछ ऐसी ही कहानी है जौनपुर जिले के मड़ियाहूं तहसील के जमालपुर गांव के रहनेवाले रामसागर भगवंत पाल की। रामसागर पाल के पिता भगवंत पाल करीब ७० वर्ष पूर्व मुंबई में आए थे। मुंबई आने के बाद लोअर परेल स्थित फिनिक्स मिल में बतौर मजदूर वो मजदूरी करने लगे। रामसागर पाल ने गांव से १२वीं तक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष १९८५ में रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई अपने पिता के पास आ गए। पिता ने रामसागर पाल को फिनिक्स मिल में ही बतौर मजदूर नौकरी लगवा दी। कुछ वर्षों तक रामसागर पाल फिनिक्स मिल में मजदूरी करते रहे लेकिन ९० के दशक में फिनिक्स मिल बंद हो गई, जिसके बाद रामसागर पाल के सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई। इसके बाद रामसागर पाल ने दूसरी कंपनियों में बतौर मजदूर काम किया लेकिन काम नहीं जमा तो उनके एक मित्र ने उन्हें सलाह दी कि मुंबई में टैक्सी चलाकर भी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। मित्र की सलाह पर रामसागर पाल ने टैक्सी चलाना शुरू किया। टैक्सी चलाने में मन लगने के साथ ही उन्हें अच्छी इनकम भी होने लगी। वर्ष १९९३ में रामसागर पाल ने फिएट कंपनी की अपनी खुद की पहली टैक्सी खरीदी। कालांतर में रामसागर पाल का विवाह हो गया। विवाहोपरांत चार बच्चे होने के बाद जब परिवार का खर्चा बढ़ा तो रामसागर टैक्सी अब ज्यादा समय तक चलाने लगे। रामसागर पाल बताते हैं कि उन्होंने १८ से २० घंटे तक मुंबई की सड़कों पर टैक्सी चलाई है। अपनी अथक मेहनत और परिश्रम के बल पर रामसागर पाल ने परिवार का भरण-पोषण जारी रखा, जिसके फलस्वरूप उनका एक बेटा पढ़-लिखकर मध्य रेलवे में नौकरी कर रहा है। दूसरे बेटे को उन्होंने विषम परिस्थितियों के बावजूद कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की शिक्षा दिलवाई। इसके अलावा उनका एक बेटा रेलवे में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम के तहत नौकरी पा चुका है। वर्ष १९८९ में रामसागर पाल ने कुर्ला टर्मिनस रेलवे स्टेशन के पास एक झोपड़ा खरीदा था। इस झोपड़े की शिफ्टिंग के तहत रामसागर पाल को मानखुर्द में खुद का फ्लैट मिला। रामसागर पाल बताते हैं कि अपने ४० वर्षों के टैक्सी चलाने के लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने २० से ज्यादा लोगों को ड्राइवर की ट्रेनिंग दी, जो आज गाड़ियां चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हुए अच्छी-खासी जिंदगी जी रहे हैं। उम्र के ६० बसंत देख चुके रामसागर पाल का कहना है कि जब तक हाथ-पैर चलेगा वे टैक्सी के धंधे को कभी नहीं छोड़ेंगे।

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