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हम उन्हें भुला न पाएंगे

दीपक शर्मा
एक समय था, जब भारत के प्रत्येक नागरिक के भीतर एक संवेदनशील इंसान मौजूद था। उस दौर में जन नेताओं की भी कोई कमी नहीं थी, लेकिन आज समय बदला है। लोगों में संवेदना मरती जा रही है, उनके मानवीय अहसासों को लगातार मारा जा रहा है। उसे दो जून की रोटी का मोहताज बनाकर उसकी बुद्धि-विवेक का हरण कर लिया गया है। अस्सी करोड़ से अधिक लोग हों या करोड़ों किसान, सब सरकारी भीख के मोहताज कर दिए गए हैं।
एक समय वह भी था, जब हमारे प्रेरणा-व्यक्तित्व ही हमारे सबसे बड़े आदर्श हुआ करते थे। महात्मा गांधी व हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे ऐसे ही जननायक थे, जिनकी एक आवाज पर हिंदुस्थान उठ खड़ा होता था। जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, उनको गोली मार देने की खबर आई तो पूरे देश में मातम पसर गया था, जैसे आमजन के घर का कोई व्यक्ति उन्हें छोड़ अंतिम यात्रा पर निकल पड़ा हो।
कुछ ऐसा ही देश में आज भी एक नाम है जो हर किसी की जुबान पर रहता है और वो है बालासाहेब ठाकरे का। १७ नवंबर २०१२ को मुंबई में ८६ साल की अवस्था में उनकी मृत्यु हुई थी। उनके निधन की खबर सुनते ही चारों ओर सन्नाटा पसर गया था। अंतिम संस्कार के दिन भी आलम वैसा ही रहा। सड़कें खाली पड़ी रहीं और गाड़ियों की आवाजाही न के बराबर थी, लोगों ने घरों के चूल्हे बुझा दिए थे। उनके निधन का सबसे अधिक सदमा उस आम हिंदू जनमानस को लगा, जो उनको इस देश के सर्वोच्च नेता के रूप में देखने की आस में था। उस दौर में देश की चारों दिशाओं में यदि कोई चर्चा का विषय था तो वह उनके जननायक बालासाहेब ठाकरे का था।
इन प्रतीक-प्रसंगों के बिना किसी फरमान के अखिल भारतीय व्यापकता का अहसास हम आज भी कर सकते हैं। यदि बात देश के निर्वाचित जननायकों की करें तो १९६४ में मई महीने के आखिर में पंडित नेहरू का निधन हुआ था। उस दौर में यह खबर सुनकर बड़े-बूढ़े गमगीन हो गए। बच्चे शायद उनके शोक का कारण न समझ रहे हों, लेकिन इतना जानते थे कि वे चाचा नेहरू थे। चाचा नहीं रहे, यानी पिता के भाई नहीं रहे। तब बच्चों को अपने बड़ों के आंसुओं और नेहरू के निधन में बस यही नाता समझ आया। उस शाम भी अधिकांश घरों में चूल्हा नहीं जला। अगले दिन लोग दिनभर नम आंखें पोंछते रेडियो पर नेहरू जी के अंतिम संस्कार का आंखों देखा हाल सुनते रहे।
तकरीबन ऐसा ही दृश्य इसके १९ महीने बाद लालबहादुर शास़्त्री के निधन पर दिखाई दिया। गांव-देहात-आदिवासी व शहरी लोग, जो कभी दिल्ली तो क्या, अपने-अपने जिला मुख्यालयों तक नहीं गए होंगे, जिन्होंने कभी नेहरू-शास्त्री को देखा तक नहीं, वे भी उनके निधन पर ऐसे शोकाकुल थे, जैसे कोई नजदीकी परिजन चला गया हो? १९६५ के भारत-पाक युद्ध के समय अन्न-संकट से निपटने के लिए शास्त्री जी ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन का व्रत रखने का आग्रह किया था। लोगों ने सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया। युद्ध समाप्त हो गया। भारत में हरित क्रांति आई। श्वेत क्रांति हो गई। उदारीकरण के बाद भारत बदल गया। मगर लोगों का सोमवार का व्रत, बिना किसी के कहे जारी रहा। ३१ अक्टूबर १९८४ को इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन भी बिना किसी के कहे, लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले। इसके पौने सात साल बाद जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो तमाम देशवासियों के मन में एक टीस सी थी गले रुंधे थे। जिन्होंने न कभी नेहरू को देखा था, न शास्त्री को, न इंदिरा को, न राजीव को। उन के लिए इतना ही काफी था कि वे हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। यह सब स्वयंस्फूर्त होता था। देशवासी बिना किसी के कहे तिरंगा लहराते थे। बिना किसी के थोपे अपने फर्ज निभाते थे। लेकिन आज हमारे स्वाभाविक भावों के लिए भी आयोजन-प्रबंधन तकनीकों के इतने उत्प्रेरक क्यों इस्तेमाल किए जाते हैं? क्या हम वैसे नहीं रहे? या, क्या हमारे प्रेरणा व्यक्तित्व वैसे नहीं रहे? जन-मन की नैसर्गिक तरंगों को बाजारू आवरणों की जरूरत क्यों पड़ने लगी है? मनोभाव हाशिए पर कैसे चले गए? सब-कुछ मंचीय प्रयोजन में तब्दील वैâसे हो गया? इन यादों के झरोखे से झांकते सवालों का जवाब आपको मिले तो सच मानिए आपके अंदर का इंसान अभी मरा नहीं जीवित है।

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