मुख्यपृष्ठधर्म विशेषभगवान सूर्य का आस्था का केंद्र है औरंगाबाद का प्राचीन देव मंदिर

भगवान सूर्य का आस्था का केंद्र है औरंगाबाद का प्राचीन देव मंदिर

अनिल मिश्र  / औरंगाबाद

अगर बात बिहार की हो और महान लोक आस्था का महापर्व छठ की तो बरबस ही औरंगाबाद के सूर्य नगरी का याद आना बिहार के लोगों का बेहद लाजिमी है। हां, हम बात कर रहे हैं उसी सूर्य नगरी देव की, जहां भारत के छठे मुगल शासक मोहिउद्दीन मोहम्मद द्वारा लाखों लोगों के आस्था का केंद्र रहे इस सूर्य मंदिर को तोड़ने के लिए पहुंचने पर मंदिर रातोंरात पूर्वाभिमुख की जगह पश्चिमाभिमुख हो गया। भारत का हिंदुओं का पहला यह मंदिर है, जिसका मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में है। पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर दवार्क मना जाता है, जो श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला है। इस मंदिर की पौराणिकता, शिल्पकला और महत्ता विरासत में मिली है। यह प्राचीन मंदिर अपनी भव्यता के लिए जहां प्रसिद्ध है, वहीं आस्था का भी बहुत बड़ा केंद्र भी रहा है। इसी कारण प्रतिवर्ष यहां कार्तिक और चैत्र मास में होने वाले छठ में बहुत बड़ा मेला लगता है। यहां पर रहकर लोग छत्तीस घंटा वाले निर्जला उपवास रखकर सूर्य भगवान और छठी मइया के पूरे आस्था के साथ अर्ध्य देने के साथ-साथ पूजा-अर्चना करते हैं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, इस सूर्य मंदिर का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किए हैं। इस मंदिर के बाहर देवताओं की भाषा संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार, राजा इला पुत्र पुरुरवा ऐल ने 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेता युग के गुजर जाने के बाद इस मंदिर का निर्माण प्रारंभ करवाया था। इस शिलालेख से इस पौराणिक महत्ता वाले इस मंदिर का निर्माण काल 1 लाख 50 हजार 22 वर्ष पूरा हुआ। वहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसे पांचवीं से छठी सदी का गुप्त कालीन में इसका निर्माण काल बताया है।
यह मंदिर अपनी अनूठी शिल्पकला के लिए प्रख्यात है। पत्थरों को तराशकर उत्कृष्ट नक्काशी द्वारा यह मंदिर का निर्माण कराया गया है। यह शिल्पकला का अनूठा मिसाल है। इस मंदिर का शिल्प उड़ीसा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर से मिलता है। यह मंदिर दो भागों में बना हुआ है। पसला गर्भ गृह, जिसके ऊपर कमल के आकार का शिखर है और इसके ऊपर सोने का कलश है। दूसरा भाग मुख मंडप है, जिसके ऊपर पिरामिडनुमा छत और छत को सहारा देने के लिए नक्काशीदार पत्थरों का स्तंभ बना है। मंदिर के प्रांगण में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों स्वरूप उदयाचल, मध्यांचल और अस्ताचल के रूप में विद्यमान हैं। इन्हें कुछ लोग सृष्टि के तीनों रचनाकार ब्रम्हा, विष्णु और महेश भी कहते हैं। किदवंतियों के अनुसार, मोहिउद्दीन मोहम्मद जिसे आलमगीर या औरंगजेब के नाम से जाना जाता था। औरंगजेब या आलमगीर के द्वारा पूरे भारत देश में मंदिर तोड़ते हुए औरंगाबाद के देव पहुंचने पर यहां के पुजारियों ने इस मंदिर को नहीं तोड़ने की आरजू-विनती करने लगे, लेकिन औरंगजेब ने यह कहते हुए वहां से चला गया कि अगर तुम लोग के भगवान में शक्ति है तो इसका दरवाजा पश्चिम का हो जाए। इस बात को कह वहां से चला गया। पूजारी लोग रात्रि भर सूर्य भगवान से प्रार्थना कर करते रहे। हे भगवान औरंगजेब की बात सही साबित हो जाए। लोग बताते हैं कि अहले सुबह जब पुजारी लोग मंदिर पहुंचे तो मुख्य द्वार पूर्व न होकर पश्चिमाभिमुख हो गया था, तब से देव सूर्य मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम की तरफ में हीं हैं। यहां पर दो तालाब भी है। इस तालाब को लोग सूर्यकुंड कहते हैं। इस तालाब का कनेक्शन समुद्र से बताई गई है। शायद इसीलिए इस देव नगरी के करीब तीन किलोमीटर की दूरी तक कुएं और चापाकल का पानी खारा है। इस तालाब के बारे में बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के राजा औलिया और इला के पुत्र परुरवा ऐल द्वारा यहां स्नान करने से कुष्ठ जैसे असाध्य रोग से मक्ति मिली थी। इसी के बाद इस देव मंदिर का निर्माण इला पुत्र ने करवाया था। प्राचीन काल से इस मंदिर की परंपरा के अनुसार, प्रत्येक दिन सुबह चार बजे भगवान को जगाकर स्नान के उपरांत वस्त्र पहनाकर फूल-माला चढ़ाकर प्रसाद भोग लगाये जाते हैं। उसके बाद आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ भगवान को सुनाने की प्रथा आदिकाल से चली आ रही है। छठ के अवसर पर यहां बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसे जिला प्रशासन औरंगाबाद आयोजित करता है। इसी कारण छठ व्रत करनेवाले लगभग सभी व्रतियों की एक अभिलाषा जरूर रहती है कि एक बार देव में जरूर छठ करें।

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