मुख्यपृष्ठग्लैमर‘दर्शकों को मनोरंजन का डोज चाहिए!' - अक्षय कुमार

‘दर्शकों को मनोरंजन का डोज चाहिए!’ – अक्षय कुमार

पिछले ७-८ वर्षों में अक्षय कुमार ने यह साबित कर दिखाया कि विपदा के समय हाथ पर हाथ धरकर बैठने से काम नहीं चलता, बल्कि विपदा से न घबराते हुए काम करते हुए सक्रिय रहना चाहिए। लॉकडाउन के दौरान अपनी फिल्मों को पूरा कर उन्होंने उनका प्रमोशन भी किया। प्रत्येक वर्ष ५ या ६ फिल्मों को पूरा करनेवाले अक्षय कुमार की हालिया रिलीज फिल्म है ‘बच्चन पांडे’, जो अलग ढर्रे की एक कॉमेडी फिल्म है। पेश है, अक्षय कुमार से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

• ‘बच्चन पांडे’ में निगेटिव रोल निभाने की क्या वजह रही?
नेगेटिव रोल निभाना एक चैलेंज है और मैं उसे बार-बार दोहराना चाहूंगा। हर कलाकार अपने करियर में एक जैसे पॉजिटिव, रोमांटिक किरदार करते-करते ऊब जाता है। ऐसा अलग किरदार करने का मन मुझे ही नहीं, कइयों को होता है। वैसे ‘बच्चन पांडे’ में कृत्रिम आंख लगाकर मैंने अपना जो अलग लुक दिया है, उसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया है।

• सभी निर्माताओं द्वारा आपको रिपीट किए जाने के बावजूद आपके खुद निर्माता बनने की क्या वजह रही?
साजिद नाडियादवाला हों अथवा रोहित शेट्टी मैं सभी निर्माताओं का चहेता हीरो हूं और जो भी निर्माता मुझे अपनी फिल्म में लेना चाहता है, मैं उसके लिए उपलब्ध हूं। एक अभिनेता और व्यक्ति के रूप में मैं विकसित होना चाहता हूं, आगे बढ़ना चाहता हूं। सच कहूं तो कुछ कमाना भी चाहता हूं। समाज को संदेश देनेवाली फिल्में बनाना चाहता हूं। अभिनेता अगर चाहे तो अपनी फिल्मों का लेखक और निर्देशक बन सकता है। गुरु दत्त और राज कपूर ऐसे ही धुरंधर मेकर्स थे, जो एक्टर होने के बावजूद अन्य कलाओं में माहिर थे।

• हर वर्ष आपकी पांच-छह फिल्में रिलीज होने के पीछे कौन-सा जादू काम कर रहा है?
मेरे पास कोई मंत्र या जादू नहीं है। मैं बस अनुशासन से काम करता हूं। टाइम टेबल के अनुसार अपनी फिल्म पूरी करने के बाद ही मैं सांस लेता हूं, जब तक फिल्म पूरी नहीं होती मुझे चैन नहीं मिलता। मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है निर्माता द्वारा किसी फिल्म के लिए निर्धारित बजट। अगर फिल्म लेट हो जाती है तो ऐसे में निर्माता को आर्थिक नुकसान होना तय है। इसे मैं अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानता हूं कि फिल्म ओवर बजट न होकर ठीक समय पर पूरी हो और किसी भी कलाकार का समय न बर्बाद हो। समय बर्बाद न होने से मेरी हर फिल्म दो महीने में पूरी हो जाती है। इस तरह एक वर्ष में मैं ५ से ६ फिल्में पूरी कर लेता हूं।

• सिर्फ दो महीनों में फिल्म की शूटिंग पूरी करना कितना आसान है?
मेरी फिल्म की शूटिंग ७ बजे शुरू हो जाती है। आज लोग मुझसे मेरी सफलता के फॉर्मूले पूछते हैं लेकिन जब मैंने १५ फ्लॉप फिल्में दीं, तब किसी ने उस दौर में मुझसे सफलता का मंत्र नहीं पूछा था। सब वक्त-वक्त की बात है। मैं किस्मत और मेहनत पर विश्वास करता हूं, उसका मैंने ताउम्र पालन किया।

• बायोपिक फिल्मों की भेड़चाल के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
फिल्म निर्माता-निर्देशक और लेखक के माइंडसेट्स से बनती है। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के जीवन पर बनी ज्यादातर बायोपिक फिल्में सफल हुई हैं। फिर चाहे वो ‘बाजीराव मस्तानी’ हो, ‘जोधा अकबर’ हो या अन्य कोई और फिल्म।

• क्या आपको नहीं लगता कि दो हीरोवाली फिल्मों में काम करने से आपकी लोकप्रियता पर इसका असर होगा?
फिल्म ‘शोले’ में संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया बच्चन जैसे सदी के सबसे बड़े सितारे थे। क्या किसी की लोकप्रियता पर इससे असर हुआ? अगर फिल्म की कहानी और उसका निर्देशन सशक्त हो तो बाकी के मुद्दे मायने नहीं रखते। मेरी दर्जनों फिल्में ऐसी हैं जिनमें मेरे अलावा अन्य हीरो मेरे साथ रहे हैं। सुनील शेट्टी, सैफ अली खान के साथ मैंने पहले भी कई फिल्में कीं। ऐसी दो हीरोवाली फिल्मों से मुझे कोई एतराज नहीं है। दर्शकों को मनोरंजन का डोज चाहिए फिर फिल्म में एक हीरो हो या दो, उन्हें इससे क्या लेना-देना? हॉलीवुड में यह ट्रेंड बहुत पॉप्युलर है।

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