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गरीबी से टूटती गांवों की कमर!

महंगाई ने जीना किया मुहाल

आमतौर पर यही माना जाता है कि बड़े शहरों में ज्यादा महंगाई रहती है। इसके मुकाबले छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में कम पैसों में भी गुजारा किया जा सकता है। मगर पिछले कुछ वर्षों में यह मिथक टूटता नजर आ रहा है। अब तो गांवों में भी महंगाई ने जीना मुहाल कर दिया है। हालत ऐसे हैं कि अब गरीबी से गांवों की कमर टूट रही है। ग्रामीणों को सामान के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे उनकी हालत और पतली हो रही है और इससे गरीबी बढ़ रही है।

दरअसल, एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले २२ में से १८ महीनों में शहरों के मुकाबले गांवों में महंगाई ज्यादा रही है। करीब २ साल के दौरान मार्च से जून २०२३ के बीच ग्रामीणों को थोड़ी राहत थी, जब शहरी महंगाई की तुलना में गांवों में महंगाई कम थी।

असल में केंद्र सरकार ने मुफ्त खाद्यान्न योजना की अवधि बढ़ाने की घोषणा की है और इससे ग्रामीण इलाकों में मांग में कमी बनी हुई है, वहीं जनवरी २०२२ के बाद २२ महीनों में से १८ महीनों में ग्रामीण इलाकों में खुदरा महंगाई दर शहरों की तुलना में ज्यादा रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएलओ) की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित ग्रामीण खुदरा महंगाई दर शहरी महंगाई की तुलना में अक्टूबर में लगातार चौथे महीने अधिक रही है। करीब २ साल के दौरान मार्च से जून २०२३ के बीच ग्रामीणों को थोड़ी राहत थी, जब शहरी महंगाई की तुलना में गांवों में महंगाई कम थी। रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर २०२३ में ग्रामीण महंगाई ५.१२ प्रतिशत थी, जबकि शहरी महंगाई दर ४.६२ प्रतिशत थी। आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण ज्यादा महंगाई दर की मुख्य वजह खाद्य वस्तुओं खासकर मोटे अनाज की कीमत अधिक होना है। हालांकि, इस साल की शुरुआत में जिस उच्च स्तर पर महंगाई थी, उसकी तुलना में थोड़ी राहत है, लेकिन मोटे अनाज की कीमतें ग्रामीण इलाकों में ११.५ प्रतिशत अधिक रही हैं, जबकि शहरी इलाकों में ९.८ प्रतिशत अधिक थीं। इंडिया रेटिंग्स में वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक पारस जसराय के अनुसार, खाद्य की कीमत में तेज बढ़ोतरी को पिछले साल लू चलने और धान और गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि से बल मिला है और इसके बाद इस साल सब्जियों की कीमत बढ़ गई। उन्होंने कहा, ‘पहले अग्रिम अनुमान से ज्यादातर खरीफ फसलों के उत्पादन की धूमिल तस्वीर सामने आ रही है, साथ ही रबी की बोआई भी सुस्त है। जलाशयों का स्तर भी निचले स्तर पर है। ऐसे में उम्मीद है कि कीमतें आगे और बढ़ेंगी और ग्रामीण महंगाई बढ़ेगी।’ बैंक आफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘शहरी सूचकांक में आवास का अधिभार करीब २२ प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह शून्य है। ऐसे में खाद्य उत्पादों का अधिभार ग्रामीण इलाकों में करीब ५४ प्रतिशत हो जाता है, जबकि शहरी इलाकों के लिए यह करीब ३६ प्रतिशत है।’ खाद्य महंगाई के अलावा प्रमुख क्षेत्र के घटकों जैसे घरेलू वस्तुओं, ढुलाई आदि में भी ग्रामीण इलाकों में कीमतों में शहरों की तुलना में इस साल अप्रैल के बाद से अधिक तेजी देखी गई है। सेवा की महंगाई दर अक्टूबर में ग्रामीण व शहरी इलाकों में क्रमश: ४.६ प्रतिशत और ४.२६ प्रतिशत रही है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं, ‘खाद्य कीमतों के अलावा ग्रामीण इलाके प्राय: आपूर्ति संबंधी व्यवधानों से प्रभावित होते हैं। महामारी के कारण ग्रामीण इलाकों में लोगों का रोजगार गया है और मांग कम बनी रही। इसका मतलब यह है कि बुनियादी ढांचे की लागत ने ग्रामीण इलाकों में कीमतें बढ़ाई हैं।’

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएलओ) की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित ग्रामीण खुदरा महंगाई दर शहरी महंगाई की तुलना में अक्टूबर में लगातार चौथे महीने अधिक रही है।’

 

 

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