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स्तंभ : ‘अग्निपथ’ की धधकती आग स्थायी नौकरी की योजना से होगी शांत

कविता श्रीवास्तव

केंद्र सरकार की ‘अग्निवीर’ योजना को लेकर देशव्यापी आंदोलन तेज हुए हैं। तीनों सेनाओं में युवाओं की चार साल के लिए भर्ती करने की केंद्र की इस योजना की प्रक्रिया कल से शुरू भी हो गई है लेकिन इस योजना को लेकर देश के बेरोजगार युवाओं को संतुष्ट करने में केंद्र सरकार को अभी तक सफलता नहीं मिली है। इसके साथ ही अतीत में सेना की भर्ती के लिए आवेदन कर चुके परीक्षार्थी भी इस अस्थायी भर्ती को लेकर खफा हैं। उनके पहले के आवेदन रद्द कर दिए गए हैं। यह नई योजना एक तरह से सेना में स्थायी नौकरी पर विराम लगाने की पहल है। फिलहाल के परिदृश्य में ऐसा ही समझा जा रहा है। हालांकि केंद्र सरकार ने इस योजना को लेकर ढेर सारी सुविधाएं देने की घोषणा की है। उदाहरण के लिए मात्र चार वर्षों की सेवा के बाद ‘अग्निवीर’ रिटायर हो जाएंगे, लेकिन उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में भर्तियों में प्राथमिकता दी जाएगी। इन चार वर्षों में उनकी भविष्य निधि की जो रकम कटेगी, उतनी ही सरकार भी देगी। यह लगभग साढ़े ग्यारह लाख रुपए तक हो जाएगी। इसके अलावा इन अग्निवीरों में से २५ प्रतिशत लोगों को सेना में स्थायी नौकरी भी दी जाएगी, लेकिन सवाल है कि शेष ७५ प्रतिशत  लोगों का क्या होगा? इस पर केवल आश्वासन ही है। अत: वर्तमान में युवा इसे चार साल की ठेकेदार पद्धति समझ कर इस अपील को ठुकरा रहे हैं। विभिन्न विरोधी दलों, राजनीतिक नेताओं, विशेषज्ञों आदि ने भी इस योजना का विरोध किया है।

उनका कहना है कि सरकार को नौकरी ही देनी है तो वह स्थायी नौकरी क्यों नहीं दे रही है? यह तो केवल एक लॉलीपॉप है। नौकरी का झुनझुना थमा कर मोदी सरकार खुद ही अपनी पीठ ठोकती दिखना चाहती है। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने इसे क्रांतिकारी कदम बताया है। फिर भी इस योजना को लेकर देश में सभी लोग एकमत नहीं हैं। सरकारी पक्ष व भारतीय जनता पार्टी आदि इस योजना को अभूतपूर्व बता रहे हैं, जबकि अन्य सभी लोग इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इसी को लेकर क्रोध में आए युवाओं तथा सेना में भर्ती होने के परीक्षार्थियों आदि ने देश के विभिन्न शहरों में आगजनी व तोड़फोड़ करते हुए हिंसात्मक प्रदर्शन किया है। कई जगहों पर स्टेशन पर लूटपाट हुई है। रेलवे की बोगियों को जला दिया गया है। ढेर सारी ट्रेनों को रद्द करना पड़ा है और हजारों मुसाफिर परेशान हैं। सड़कों पर आगजनी करते हुए दुकानों और वाहनों को भी नहीं बख्शा गया है। इस विरोध की ज्वाला और हिंसा अभी भी बुरी तरह से फैली हुई है। इसी बीच केंद्र सरकार ने इस योजना की प्रक्रिया को आरंभ कर दिया है। इस विरोधाभास के बीच विवाद भी जारी है। विरोधी दलों का कहना है कि मोदी सरकार हमेशा की तरह किसी भी योजना को लागू करने से पहले विभिन्न विरोधी दलों, सामाजिक संगठनों व आम जनता की राय कभी नहीं लेती है। वह हमेशा तानाशाही और निरंकुशता से किसी भी योजना की मनमानी घोषणा कर देती है। किसानों के लिए लाए गए तीन विधेयक को साल भर तक चले विरोध प्रदर्शन, धरना, हिंसा आदि के बाद सरकार ने वापस लिया। नोटबंदी और जीएसटी भी इसी तरह अचानक लागू की गई। केंद्र सरकार बेरोजगारी के मुद्दे पर विफल है। सरकारी संस्थानों में निजी कंपनियों की भागीदारी लगातार बढ़ा कर सरकारी नौकरियां खत्म की जा रही हैं। इसीलिए नौकरियां देने का सामर्थ्य सरकार के पास नहीं है। सेना को अब तक ठेकेदारी प्रणाली से दूर रखा गया था। लेकिन ‘अग्निवीर योजना’ के माध्यम से उसमें भी चार साल की ठेकेदारी प्रथा की घुसपैठ शुरू की जा रही है। इसी को लेकर देशव्यापी विरोध जारी है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार के नुमाइंदे व भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता व संबंधित अन्य ने इस योजना की खूब तरफदारी की है। लेकिन क्योंकि यह योजना ठेकेदारी प्रणाली की तरह चार साल की एक अस्थायी नौकरी लेकर आई है। इसमें न स्थायित्व है, न पेंशन सुविधा है, न मुफ्त चिकित्सा, यात्रा भत्ते व अन्य सरकारी सुविधाएं हैं। वेतनमान भी ठेकेदार पद्धति की तरह है। इसलिए नौकरी की तलाश में भटक रहे शिक्षित युवा व अन्य इस योजना से बेहद निराश हैं। यह योजना एक तरह से आगे के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में कोई ठोस उपाय बताने वाली योजना नहीं है। यह केवल तात्कालिक खानापूर्ति करके अपनी पीठ ठोंकने के अलावा और कुछ नहीं है। कुल मिलाकर यही अपेक्षा है कि केंद्र सरकार बताए कि फिलहाल युवाओं को स्थायी नौकरी देने के लिए वह क्या कर रही है? बेरोजगारी पर उसकी क्या योजना है? इस बारे में कोई ठोस नीति या योजना है भी या नहीं है। ऐसी कोई घोषणा भी वह कर ही नहीं रही है। पढ़ाई-लिखाई करके रोजगार पाने के लिए आतुर युवा व उनके परिवार इसी बात से बेहद नाराज हैं। इसलिए ‘अग्निवीर’ को लेकर हो रही हिंसा, विरोध आदि की अग्निज्वाला पैâली है। यह दु:खद है। ऐसा नहीं होना चाहिए। देश के युवाओं से ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया हम नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे हमारे आनेवाले कल के कर्णधार हैं। इसलिए केंद्र सरकार को तत्काल उनसे बात करनी चाहिए। गलतफहमियां दूर करनी चाहिए। बेरोजगारी पर अपनी नीति को स्पष्ट करना चाहिए। सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह देश के युवाओं के लिए स्थायी नौकरी की व्यवस्था करने के उपाय करे। लोगों को ऐसी नौकरियां दे जिसमें पेंशन हो, उनका भविष्य सुरक्षित हो, उनका परिवार सुरक्षित हो। उन्हें एक कर्मचारी के रूप में सरकार की सुविधाएं मिले। पेंशन मिले, चिकित्सा सुविधा मिले, आवास मिले। उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने हमेशा से ही स्वरोजगार; यहां तक कि पकौड़े बेचने जैसी बातें करके सरकारी नौकरी की उम्मीदों पर पानी फेर रखा है। उनकी बातों को क्रांतिकारी मानने की कोई तैयारी समाज में नहीं है। अधिकांश पढ़ा-लिखा नौजवान नौकरी करना चाहता है। उसका परिवार भी सुरक्षित नौकरी की उम्मीद करता है। आम जनता की इस अपेक्षा पर मोदी सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है। इसीलिए जो अग्नि वर्तमान में ज्वाला बन रही है वह संभवत: इसी विफलता के खिलाफ आम नागरिकों की प्रतिक्रिया है। इस पर केंद्र सरकार को तत्काल ठोस कदम उठाने की जरूरत है। आम जनता को समझ में आए, उनकी सहमति हो और वे स्वीकार करें ऐसी योजनाएं अमल में लानी चाहिए। इसके लिए स्वयं प्रधानमंत्री को आगे आकर हमेशा की तरह अपनी मुखर वाणी से आश्वासन देने का काम करना चाहिए। देश के नागरिक यही उम्मीद करते हैं। हर हाल में देश में धधक रही अग्नि को शांत करना चाहिए।

 (लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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