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महामारी में हुआ मुंबईकरों की हड्डियों का बुरा हाल! बढ़ गई ऑर्थोपेडिक मरीजों की संख्या

 ५,००५ लोगों पर किया गया सर्वेक्षण
 ७५ फीसदी लोगों में मिली समस्या
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई। कोरोना महामारी ने मुंबईकरों की हड्डियों का बुरा हाल कर दिया है। इतना ही नहीं, लोगों के जोड़ों के भी ‘बोल’ बिगाड़ दिए हैं। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शहर में ऑर्थोपेडिक मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण लोगों में शारीरिक गतिविधि में कमी और जीवनशैली में आए बदलाव हैं। डॉक्टरों की टीम ने हड्डी और जोड़ों की समस्याओं के अलावा कोरोना के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में भी जानने की कोशिश की।
५,००५ लोगों पर किया गया अध्ययन
फोर्टिस, हीरानंदानी, वाशी और एसएल रहेजा अस्पताल की टीमों द्वारा किए गए अध्ययन में १८ साल से ऊपर के ५,००५ मुंबईकरों को शामिल किया गया था। इसमें ६५ फीसदी महिलाएं और ३५ फीसदी पुरुष मरीज शामिल थे। इनकी आयु ३१ से ४० के बीच में थी। सर्वेक्षण में गैजेट्स के उपयोग, कार्यालयीन और घर के कामों के बीच संतुलन, कोरोना काल के दौरान जीवनशैली में बदलाव और हड्डियों के स्वास्थ्य के महत्व पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। इससे पता चला कि बहुत से लोग हड्डियों और जॉइंट हेल्थ पर ध्यान नहीं देते हैं।
गतिविधियों से दो साल तक रहे दूर
ऑर्थोपेडिक्स व जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. कौशल मल्हन ने बताया कि महामारी की वजह से लोग पिछले दो साल से अपने व्यायाम और गतिविधियों की दिनचर्या से दूर थे। अब कोविड से प्रतिबंध हटा लिया गया है। अब उन्हें अपने कोविड के पहलेवाली जीवनशैली और व्यायाम की दिनचर्या में वापस जाने के लिए सचेत रहने की जरूरत है। उन्हें हड्डियों की सेहत से संबंधित किसी भी प्रकार की परेशानी की जांच करवानी चाहिए, जिस पर लॉकडाउन की वजह से शायद उन्होंने ध्यान नहीं दिया। लंबे समय तक इन बातों को टालने से खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। इसलिए समय पर जांच और उपचार अब जरूरी हो गया है। यदि वे सेहतमंद हैं और जिम वापस जा रहे हैं, तो किसी प्रोफेशनल की निगरानी में ही ट्रेनिंग लें।
सर्वेक्षण में जानकारी आई सामने
डॉ. मनन गुजराती ने बताया कि सर्वेक्षण में पाया गया कि ३,५०० से अधिक डब्ल्यूएफएच उत्तरदाताओं ने महसूस किया कि उचित डेस्क या वर्कस्टेशन की कमी के कारण उनके शरीर का पोश्चर बिगड़ा। इससे बार-बार लोकलाइज्ड मसल्स में खिंचाव, दर्द हुआ और कार्य क्षमता में कमी आई। नियमित रूप से स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज और समय पर आसन में बदलाव और लंबे समय तक बैठने से ब्रेक जैसे सरल उपायों को अपनाकर इसे दूर किया जा सकता है। महामारी हो या न हो, काम का सुविधाजनक माहौल पेशेवर और व्यक्तिगत दोनों मोर्चों पर उत्पादकता बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि २६ फीसदी मुंबईकरों ने अस्पताल जाने के भय से जांच में देरी की। ५८ फीसदी लोगों ने गंभीर स्थिति न होने के चलते मामूली उपचार से अपनी ऑर्थोपेडिक समस्याओं को दूर किया।
ऐसी रही लोगों की जीवनशैली
कोरोना महामारी में ५६ फीसदी मुंबईकरों ने घर संभालने के साथ ही बुजुर्गों और बच्चों को संभालने के साथ ही सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। ७३ फीसदी लोगों के घरों में काम करने के लिए उचित सेटअप नहीं था। ४१ फीसदी लोगों ने १० घंटे से अधिक समय तक काम किया। १८ फीसदी मुंबईकर कंप्यूटर पर काम करने की बजाय मोबाइल से ही चिपके रहे। ४० फीसदी लोगों ने दो से चार घंटे घर और बाहर का काम किया। इस दौरान ७५ फीसदी मुंबईकरों हड्डी और जॉइंट से जुड़ी समस्याओं का सामना किया। २५ फीसदी लोगों ने गर्दन और कंधे, १९ फीसदी ने पीठ और पैर की समस्याओं का अनुभव किया। वहीं ८ फीसदी लोगों में अंग सुन्न होने की शिकायत महसूस हुई। इसी तरह २५ फीसदी लोग बेचैनी के कारण पर्याप्त नींद नहीं ले सके। दूसरी तरफ ५८ फीसदी ने अपनी विभिन्न बीमारियों पर उपचार कराया।

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