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केंद्र सरकार जनता पर नहीं कर रही है रहम; निजीकरण की दिशा में एक और कदम!

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्तियों को औने-पौने दामों में निजी व्यापारियों को बेचा जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहे कि वेंâद्र सरकार की मंशा है कि सभी वंâपनियों को बेचकर पूंजीपरियों के हाथ में बागड़ोर दे दी जाए। साथ ही विनिवेश से प्राप्त राशि का उपक्रमों के विकास के लिए प्रयोग नहीं किया गया, न ही इसे सामाजिक आधारिक संरचनाओं के निर्माण पर खर्च किया गया। यह राशि सरकार के बजट के राजस्व घाटे को कम करने में ही लग गई। केंद्र की भाजपा सरकार ने निजीकरण की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए लोकसभा में ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने बिजली संशोधन विधेयक २०२२ पेश किया। विपक्षी पार्टियों ने इसका जमकर विरोध किया। विपक्ष ने इसे इलेक्ट्रिीसिटी इंडस्ट्री के निजीकरण की दिशा में एक कदम बताया। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि यह विधेयक कॉपरेटिव मूवमेंट का उल्लंघन करता है। साथ ही राज्यों के अधिकारों को कम करने वाला है।
विभाग के कर्मचारी विरोध में उतरे
सरकार का कहना है कि इस विधेयक से बिजली वितरण क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा निजी कंपनियों की एंट्री का रास्ता तैयार होगा। इस सेक्टर में निजी कंपनियों का दखल बढ़ने से सस्ती बिजली का दौर समाप्त होगा। इस कानून के जरिए बिजली सेक्टर के ७५ अरब डॉलर के कर्ज का संकट दूर करने का प्रयास कर रही है। हालांकि कानून के बनने से पहले ही इसका विरोध शुरू हो गया है। बिजली विभाग के २७ लाख कर्मचारियों समेत विपक्षी पार्टियों ने भी इस कानून के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
३०० से २३ करना चाहती है सरकारी वंâपनियों की संख्या
सरकार ने इस मामले में एक दीर्घकालीन रणनीति तैयार की है। इसके तहत सरकारी क्षेत्र से जुड़ीं कंपनी, पीएसयू और अन्य संस्थानों को दो हिस्से में बांटा गया है। एक हिस्सा वह है जिसमें कंपनियों और पीएसयू का सरकार ५१ फीसदी हिस्सा बेच चुकी है। सरकार की योजना अगले तीन सालों में इनका पूर्ण निजीकरण करने का है। सरकार ने फिलहाल कुछ कंपनियों, पीएसयू और संस्थानों को रणनीतिक क्षेत्र में शामिल किया है। इनमें परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, रक्षा, ट्रांसपोर्ट, ऊर्जा, वित्तीय सेवा जैसे विभाग शामिल हैं। सरकार इस क्षेत्र को निजीकरण और विनिवेश से फिलहाल दूर रखेगी। इसके अलावा सरकारी क्षेत्र की ३०० कंपनियां, पीएसयू और सरकारी उपक्रमों में से अधिकतम का पूर्ण निजीकरण या इनका ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बेचने का है। सरकार की योजना रणनीतिक क्षेत्र से जुड़ी सरकारी कंपनियों की संख्या तीन साल में ३०० से घटाकर २३ करने की है।

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