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मोदी राज में डूब रही देश की अर्थव्यवस्था : तीन साल में बंद हुए ३२ हजार उद्योग! … व्यापारिक संगठन ‘कैट’ का खुलासा

२०२२-२३ में सबसे ज्यादा १३,२९० लघु उद्योग पर लगा ‘ग्रहण’
सामना संवाददाता / मुंबई
मोदी सरकार के राज में देश की अर्थव्यस्था का हाल काफी बुरा हो गया है। इस कारण देश में बेरोजगारी काफी बढ़ गई है। यह इसी से समझा जा सकता है कि पिछले तीन वर्षों में हिंदुस्थान में करीब ३२ हजार छोटे उद्योग बंद हो चुके हैं। यह खुलासा व्यापारिक संगठन ‘कैट’ ने किया है। ये लघु उद्योग ही हैं, जिनसे असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियां उत्पन्न होती हैं।
बता दें कि कोरोना काल के दौरान और उसके बाद से ही लघु उद्योगों पर संकट मंडरा रहा है। यही कारण है कि इतनी बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों ने कई प्रकार की परेशानियों का सामना करते-करते अपना दम तोड़ दिया। कई उद्योग बंद होने के कगार पर हैं। पिछले साढ़े तीन साल में करीब ३२,५०० उद्योग बंद हो चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार इस विषय का कोई संज्ञान नहीं ले रही है। ‘कैट’ के अनुसार, लघु उद्योगों को देश के रीढ़ की हड्डी कहा जाता है, पर सरकार इसके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। देश के व्यापारियों का सबसे बड़े संगठन ‘कैट’ ने यह आरोप लगाते हुए सरकार को इस पर ध्यान देने की नसीहत दी है। बता दें कि वैश्विक संस्थाएं भले ही हिंदुस्थान की अर्थव्यवस्था को स्टार परफॉर्मर बताती हों, लेकिन देश की मैन्युपैâक्चरिंग में ३६ प्रतिशत का योगदान करने वाले सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग (एमएसएमई) सिमट रहे हैं। उद्यम पोर्टल के मुताबिक, १ जुलाई २०२० से लेकर १२ दिसंबर २०२३ के बीच ३२,४७७ एमएसएमई बंद हो चुके हैं।
इस साल मार्च में खत्म वित्त वर्ष २०२२-२३ में सबसे ज्यादा १३,२९० एमएसएमई पर ‘ग्रहण’ लगा है। वित्त वर्ष २०२३-२४ में भी १२ दिसंबर तक १२,७९० एमएसएमई पर ताला लग चुका है। लगातार बदलते हालात एमएसएमई पर भारी पड़ रहे हैं। वैâट के प्रदेश महामंत्री शंकर ठक्कर ने बताया कि उद्योगों के बंद होने के कई कारण हैं। हाल के वर्षों में सरकार ने वैâशलेस लेन-देन, डॉक्यूमेंटेड सर्विसेज, जीएसटी, ई-कॉमर्स मार्केटिंग, वैश्विक मानक और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित कई नीतिगत बदलाव किए। इन बदलावों ने पारंपरिक उद्यमियों को बड़ा झटका दिया। उन्हें ऐसे नियमों की आदत नहीं थी। केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय के मुताबिक, बीते सात सालों में एमएसएमई की संख्या ४८ प्रतिशत घट गई है। २०१६ में देश में जहां ६.२५ करोड़ एमएसएमई थे, वहीं अब इनकी तादाद घटकर करीब आधी यानी ३.२५ करोड़ रह गई है।
देश से कुल निर्यात में एमएसएमई की हिस्सेदारी तीन साल में करीब ५० प्रतिशत से घटकर ४४ प्रतिशत से कम रह गई है। एक तरफ जहां बड़ी कंपनियां दिन-ब-दिन बड़ी हो रही हैं, वहीं छोटे उद्योग धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं। ठक्कर ने बताया कि आने वाले दिनों में सरकार ने इन छोटे उद्योगों की आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं दिया तो देश आर्थिक रूप से पिछड़ जाएगा।

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