मुख्यपृष्ठनए समाचारऋण की संस्कृति ने हमें धकेला कर्ज के अंधे कुएं में!

ऋण की संस्कृति ने हमें धकेला कर्ज के अंधे कुएं में!

सुषमा गजापुरे

आज के आधुनिक युग में हर व्यक्ति भौतिकतावाद के चंगुल में फंसकर अपनी जीवनशैली को दूसरों की नकल में ढालने में लगा है। इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है। भविष्य की जमा-पूंजी भी इसी आधुनिक और भौतिक चमक-दमक में आज ही दांव पर लगा दी जाती है। अपने पूर्वजों की जीवनशैली पर अगर हम नजर डालें तो उस काल में आमदनी के स्रोत आज की तुलना में बेहद सीमित हुआ करते थे। उनकी जीवनशैली भी बहुत साधारण हुआ करती थी। उस समय बैंक जैसी कोई सुविधा नहीं थी और साहूकार के ब्याज में उनका हिसाब-किताब नहीं बैठता था। इसलिए वे जीवन के कठिन समय के लिए जैसे कि बच्चों के विवाह अथवा अकस्मात आनेवाले खर्चे हेतु अपना थोड़ा-थोड़ा धन आभूषणों के रूप में संभालकर रखते थे।
आज हर व्यक्ति को आधुनिकता और भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ जीवनयापन करना बहुत अच्छा लगता है। समाज में अपना वर्चस्व और दबदबा बनाने के लिए अत्यधिक महंगी वस्तुओं को खरीदने का चलन इन दिनों चरम पर है। फिर चाहे इसके लिए कोई भी मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। ऐसे समय में बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां लोगों की इच्छाओं को पूर्ण करने की सूत्रधार बन गई हैं और लोगों की असीमित, अवांछित जरूरतों को पूरा करने का उन्होंने बीड़ा उठाया हुआ है। इसके लिए बैंकों, नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों द्वारा विकल्प सामने आया लोन अथवा ऋण के रूप में। लोन के आ जाने से आम आदमी को बहुत सुविधा हुई। बच्चों की पढ़ाई हो या उच्च शिक्षा हेतु शिक्षा लोन, बच्चों के विवाह हेतु व्यक्तिगत लोन, मकान बनाने के लिए होम लोन और गाड़ी खरीदने के लिए कार लोन जैसे कई महत्वपूर्ण विकल्प आ जाने से आम आदमी अपनी सीमित आमदनी में बच्चों की शिक्षा, उनके विवाह, स्वयं का घर अथवा गाड़ी लेने का जो सपना देखता था, वह इस लोन के माध्यम से पूर्ण हुआ।
कुछ आवश्यक कागजातों को दिखाकर आपको लोन मिल जाता है। ऐसे में एक और नया झुनझुना बैंक की ओर से आम आदमी को दिया गया, जिसका नाम है ‘क्रेडिट कार्ड’। आपके पास इस समय पैसा नहीं है तो कोई बात नहीं, हम आपको क्रेडिट कार्ड दे रहे हैं। जाइए, आपकी जितनी मर्जी है शॉपिंग कीजिए फिर पैसे थोड़े-थोड़े लौटाते रहिए। ऐसे में क्रेडिट कार्ड एक और माध्यम बन गया लोन अथवा कर्ज लेने-देने का। जहां क्रेडिट कार्ड और व्यक्तिगत लोन की संख्या बढ़नी शुरू हुई तो उसके साथ ही उनके डिफॉल्ट की संख्या में २०२३ में बहुत वृद्धि हो गई। भारतीय रिजर्व बैंक के कान तब खड़े हुए जब व्यक्तिगत लोन में डिफॉल्ट की संख्या ३० प्रतिशत तक बढ़ गई। इसका मतलब ये हुआ कि हर १०० में से ३० लोग जो क्रेडिट कार्ड पर ऋण लेते थे या फिर किसी किस्म का पर्सनल लोन लेते थे, वो उसकी किश्तों को पूरा करने में असमर्थ होने लगे। यहां से बैंकों और फाइनेंस कंपनियों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट बढ़ने लगे। इससे पहले कि बात और बिगड़ती रिजर्व बैंक ने बैंकों और फाइनेंस कंपनियों पर कड़ाई बरती और उनके रिस्क रिजर्व को १२५ प्रतिशत और १५० प्रतिशत तक बढ़ा दिया। इसके साथ ही बैंकों और फाइनेंस कंपनियों को निर्देश दिए कि तुरंत असुरक्षित अथवा अनसिक्योर्ड लोन सीमित कर दिए जाएं। अनसिक्योर्ड लोन का मतलब होता है, वो लोन जिनमें किसी भी किस्म की आय, गारंटी अथवा मॉर्गेज के प्रावधान नहीं होते और बिना ज्यादा पड़ताल के ये लोन सीधे प्रदान अथवा स्वीकृत कर दिए जाते हैं।
अगर आप किसी बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स शोरूम में जाते हैं और आप कोई वस्तु जैसे कि वॉशिंग मशीन, मोबाइल, स्कूटर-मोटर साइकिल, एयर कंडीशनर, टेलीविजन आदि खरीदना चाहते हैं तो शोरूम के सेल्समैन ही आपकी मुलाकात फाइनेंस कंपनी के व्यक्ति से वहीं करवा देते हैं, वहीं कुछ मिनट में ये अनसिक्योर्ड लोन स्वीकृत हो जाते हैं और आप अपनी मनचाही वस्तु लेकर घर आ जाते हैं। और वस्तु की कीमत कई किश्तों में पूरा कर लेते हैं।
इस प्रक्रिया में जहां आम आदमी को ये फायदा हुआ कि आप क्रेडिट पर कोई छोटी चीज भी खरीद सकते हैं, पर जब ये सुविधा एक आदत में बदल जाती है और आप अपनी समर्थता से अधिक लोन ले लेते हैं और फिर उसकी ईएमआई चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं तो फिर आप डिफॉल्ट करते हैं। अब यही डिफॉल्स अब एक ऐसी सीमा पार कर गए हैं, जहां आरबीआई के कान खड़े हो गए हैं और आनन-फानन में बैंकों और वित्तीय कंपनियों पर शिकंजा कस दिया। अब आम आदमी को किसी भी किस्म के अनसिक्योर्ड लोन पाने के लिए कई पापड़ बेलने पड़ेंगे साथ ही वित्त कंपनियों के लिए अपना व्यापार चलाने में बहुत कष्ट होगा। ये स्थिति व्यापार के लिए भी कष्टदायक है, क्योंकि उनकी बिक्री में बहुत बड़ी कमी आने की आशंका है। भारत में बहुत बड़ा व्यापार इसी अनसिक्योर्ड लोन के सहारे चलता था, पर अब उसके बंद होने पर बाजार लुढ़कता हुआ नजर आ रहा है और निर्माताओं के चेहरे पर चिंता की रेखाएं साफ देखी जाने लगी हैं। इसी के साथ नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां भी अब सकते में हैं कि इस बाजार में आखिर अब जिंदा कैसे रहा जाए?
हमने इस प्रकार के अनसिक्योर्ड लोन के दुष्परिणाम अमरीका में वर्ष २००८ में देखे थे, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में अर्थ संकट पैदा हो गया था। वर्ष २००८ में अमेरिका में आई मंदी इस बात की गवाह थी कि जब आदमी अपनी जरूरतों से ज्यादा खर्च करने के लिए कर्ज या लोन लेता है तो उसके परिणाम कितने गंभीर हो सकते है। उस मंदी ने दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया और भारत भी इस से अछूता नहीं रहा। आज २०२३ में हमारा देश भी विकट परिस्थिति में आ खड़ा हुआ है। विवाह, शिक्षा, घर और गाड़ी तक तो बात उचित लगती है, लेकिन अब तो बाजार में नए उत्पाद आते ही उसे खरीदने की चाह में कर्ज लिए जा रहे हैं। किंतु अब लगता है कि आम भारतीय को अपनी चादर देखकर पांव पसारने वाली कहावत से कोई लेना-देना नहीं है। यहां तक कि वो अपने जीवन के मुश्किल समय के लिए कुछ बचत नहीं कर रहे। आम भारतीय की बचत अब गिरकर ५.५ प्रतिशत पर आ गई है, जो ऐतिहासिक रूप से ७५ वर्षों में सबसे कम है। कर्ज लेना कोई बुरी या गलत बात नहीं है, किंतु वह किन आवश्यकताओं के लिए लिया जा रहा है, यहां यह सोचना जरूरी हैं। लोन कई बार हमारे जीवन के कठिन समय में अत्यधिक फायदेमंद भी साबित होता है। समय रहते हमें अपनी अनावश्यक जरूरतों को कम करके अपनी आमदनी को देखते हुए खर्च करने की आदत डालना होगा और अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए मेहनत करके अपनी आमदनी बढ़ाना ज्यादा श्रेयकर होगा। चादर से बाहर पांव निकालने से हानि हमारे पांव की ही होगी, यह हमें समय रहते सोच लेना चाहिए। अन्यथा कर्ज रूपी सुरसा हमारा सुख-चैन लूट लेगी।
(लेखिका प्रसिद्ध चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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